गंगटोक : हालिया ईंधन संकट के दौरान 18 से 31 मई तक लागू की गई सिक्किम सरकार की ऑड-ईवन वाहन नीति अब कानूनी और सार्वजनिक बहस का विषय बन गई है। इस नीति के तहत राज्य में पंजीकृत 55,967 निजी चार पहिया वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाया गया था, जबकि सार्वजनिक परिवहन और व्यावसायिक यात्री वाहनों को संचालन की अनुमति दी गई थी।
हालांकि, आधिकारिक परिवहन रिकॉर्ड, पर्यटन गतिविधि डेटा और सिक्किम हाई कोर्ट की टिप्पणियों ने एक अहम सवाल पर फिर से ध्यान खींचा है कि क्या राज्य के पास इतनी बड़ी संख्या में निजी वाहनों पर पाबंदियां लगाने के लिए काफी जन परिवहन क्षमता थी?
इस मामले पर दायर जनहित याचिका पर 9 जून को सुनवाई के दौरान सिक्किम हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि प्रतिबंध लागू करने के बाद आम लोगों की आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए क्या वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था की गई थी। अदालत ने सरकार को इस संबंध में विस्तृत जानकारी रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी।
28 फरवरी, 2026 तक के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, सिक्किम में कुल 1,39,876 पंजीकृत वाहन थे। इनमें से 55,967 निजी चारपहिया वाहन थे, जिन पर ऑड-ईवन पाबंदियों का सीधा असर पड़ा है। वहीं, सरकारी वाहनों की संख्या 5,351 थी, जिसमें 4,935 चारपहिया और 416 दोपहिया वाहन शामिल थीं। हालांकि पाबंदियों का निशाना निजी कारें थीं, लेकिन सरकार का कहना था कि बसों, टैक्सियों और दूसरे वाणिज्यिक यात्री वाहनों के जरिए जनता के लिए परिवहन के काफी दूसरे विकल्प मौजूद थे।
आंकड़े बताते हैं कि राज्य में केवल 117 सरकारी बसें संचालित हो रही थीं, जबकि 15,367 टैक्सियां, 6,514 मैक्सी कैब और 3,005 लक्जरी पर्यटक वाहन उपलब्ध थे। यानी सार्वजनिक परिवहन की तुलना में व्यावसायिक यात्री वाहनों की संख्या 24,000 से अधिक थी। प्रतिबंधित 55,967 निजी वाहनों के मुकाबले केवल 117 सरकारी बसें थीं, अर्थात लगभग हर 478 निजी वाहनों पर एक सरकारी बस उपलब्ध थी। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी परिवहन व्यवस्था इतने बड़े स्तर पर निजी वाहनों का विकल्प नहीं बन सकती थी। इससे स्पष्ट होता है कि ऑड-ईवन अवधि के दौरान लोगों की आवाजाही मुख्य रूप से निजी व्यावसायिक परिवहन पर निर्भर रही।
इस आंकड़े का मतलब यह नहीं है कि हर बस 478 वाहनों की जगह लेगी। हालांकि, यह दिखाता है कि अगर पाबंदी के समय लोगों को निजी वाहनों का इस्तेमाल बंद करना पड़ा, तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम के सामने कितनी बड़ी चुनौती होगी। भले ही सभी 117 बसें ज़्यादा से ज़्यादा क्षमता और फ्रीक्वेंसी पर चलतीं, फिर भी अकेले सरकार का पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क पॉलिसी से प्रभावित प्राइवेट वाहनों की संख्या का सीधा विकल्प नहीं बन सकता था।
हाई कोर्ट में भी बहस का यही मुद्दा है कि सरकार द्वारा संचालित सार्वजनिक परिवहन और निजी तौर पर संचालित वाणिज्यिक परिवहन को एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बसें तय रूट और समय-सारणी पर चलती हैं और आम तौर पर आबादी के बड़े हिस्से को किफायती यात्रा सुविधा देने के लिए बनाई जाती हैं। इसके विपरीत, टैक्सी, मैक्सी कैब और पर्यटक वाहन किराया-आधारित सेवा देते हैं और रूट की मांग और कमर्शियल फायदे पर निर्भर करते हैं।
हालांकि कमर्शियल ऑपरेटरों ने निश्चित रूप से ईंधन संकट के दौरान यात्रा की सुविधा दी, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे सार्वजनिक परिवहन का पर्याप्त विकल्प थे, खासकर ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में। इस बीच, पर्यटन गतिविधियां भी जारी रहीं। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार 18 से 29 मई के बीच नाथुला और आसपास के पर्यटन स्थलों की ओर 21,083 पर्यटक वाहनों की आवाजाही दर्ज की गई। इसका मतलब है कि ऑड-ईवन पाबंदियां लागू होने के दौरान हर दिन औसतन लगभग 1,757 पर्यटक वाहनों की आवाजाही हुई। इससे संकेत मिलता है कि ईंधन संकट के दौरान भी पर्यटन क्षेत्र को सुचारू रखने पर विशेष ध्यान दिया गया।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि पर्यटन से जुड़ी आवाजाही को बनाए रखना सरकार के नजरिए में महत्वपूर्ण है। पर्यटन सिक्किम के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रों में से एक है और परिवहन, आतिथ्य और संबंधित उद्योगों में हजारों लोगों की आजीविका का आधार है। वाणिज्यिक पर्यटक वाहनों पर पाबंदी लगाने से संभवत: दूरगामी आर्थिक परिणाम होते। जिलेवार आंकड़ों में भी परिवहन सुविधाओं में भारी असमानता सामने आई है। गंगटोक जिले में अधिकांश टैक्सियां और बसें केंद्रित हैं, जबकि मंगन जैसे दूरस्थ जिलों में परिवहन विकल्प बेहद सीमित हैं। आंकड़ों के अनुसार, गंगटोक जिले में 91,572 पंजीकृत वाहन थे, जो राज्य के कुल वाहनों का 65 प्रतिशत से अधिक है। इस जिले में 12,350 टैक्सी, 3,650 मैक्सी कैब, 1,885 लग्जरी पर्यटक वाहन और 643 पंजीकृत बसें भी शामिल थीं। इसके उलट, मंगन जिले में सिर्फ 421 टैक्सी, 602 मैक्सी कैब, 198 लग्जऱी टूरिस्ट गाडय़िां और 14 बसें थीं। शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच भी ऐसे अंतर से यह सवाल उठ रहा है कि क्या राज्य के सभी क्षेत्रों के लोगों को समान परिवहन सुविधाएं उपलब्ध थीं।
सरकार का कहना है कि ऑड-ईवन व्यवस्था केवल ईंधन बचाने और घबराहट में खरीदारी रोकने के लिए अस्थायी आपातकालीन कदम था, जिसे पर्याप्त पेट्रोल-डीजल भंडार उपलब्ध होने के बाद वापस ले लिया गया। हालांकि, अब बहस का केंद्र यह बन गया है कि क्या निजी वाहनों पर प्रतिबंध लगाने से पहले राज्य की सार्वजनिक परिवहन क्षमता पर्याप्त थी। बहरहाल, हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच यह मामला भविष्य में आपातकालीन परिस्थितियों में लागू की जाने वाली परिवहन नीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
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