गंगटोक : पश्चिम सिक्किम के देंताम निर्वाचन क्षेत्र के मध्य मांगमू क्षेत्र में बीते जनवरी-फरवरी महीने में एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोज की गई है। प्रारंभिक तौर पर इसमें बड़े पत्थर की संरचनाओं का एक समूह मिला है, जिसमें मेनहिर (सीधे खड़े पत्थर) और विशाल शिला-जैसी आकृतियां शामिल हैं। माना जाता है कि ये किसी प्राचीन पाषाणकालीन कब्रिस्तान का हिस्सा हैं।
सिक्किम के प्राचीन इतिहासकार और पुरातत्वविद् हरि चंद्र शर्मा द्वारा किए गए शोध से पता चलता है कि यह स्थल मेघालय की खासी-जयंतिया पहाडिय़ों की जीवित जनजातीय परंपरा में आज भी संरक्षित दफनाने की पाषाणकालीन प्रथाओं से काफी मिलता-जुलता है। मेनहिरों और शिला पत्थरों की व्यवस्था, पैमाना और स्थिति खासी-जयंतिया क्षेत्र में पाए जाने वालों की हूबहू मिलती हैं।
विशेष रूप से, मध्य मांगमू स्थल पर स्थित मेनहिर और शिला पत्थर वैसे ही पूर्व दिशा की ओर उन्मुख हैं जैसे जयंतिया पहाडिय़ों में भी देखा जाता है। दिशाओं की यह समानता, समग्र संरचनात्मक विशेषताओं के साथ मिलकर इस प्रारंभिक परिकल्पना को बल देती है कि संभवत: कोई पाषाणकालीन समुदाय पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र की ओर पलायन कर गया था, जो अपने साथ दफनाने तथा सामुदायिक जीवन से जुड़े अपने विशिष्ट विचारों को भी ले आया था।
पश्चिमी सिक्किम में किए गए आगे के खोजों में कई गुफाएं भी मिली हैं जिनमें से कुछ घने जंगलों में स्थित हैं, तो कुछ नदियों के किनारों पर। इनमें से कई गुफाएं वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। इन गुफा स्थलों के गहन अन्वेषण की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दुर्गम भूभाग में, जहां आवास के लिए कोई अन्य तत्काल विकल्प उपलब्ध नहीं था, ये गुफाएं प्रारंभिक मानव समूहों के लिए प्राकृतिक आश्रय स्थलों का काम करती थीं।
पूर्वी नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी इसी तरह की पाषाणकालीन कब्रिस्तान मिले हैं जो खास कर प्राचीन किरात समुदाय से जुड़ी हैं। पश्चिमी सिक्किम में मिली खोजों के साथ इनकी संरचनात्मक और स्थान-संबंधी समानताएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जो संपूर्ण पूर्वी हिमालयी भूभाग में संभावित सांस्कृतिक संबंधों की ओर संकेत करती हैं।
इसके अतिरिक्त, पश्चिमी सिक्किम के विभिन्न स्थानों से प्राप्त नवपाषाणकालीन औजार यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में मानव के रहने का इतिहास कई हजार वर्ष पुराना है। इन कलाकृतियों की मौजूदगी इस बात की ओर इशारा करती है कि हिमालय के इस हिस्से में प्राचीन काल से ही पशुपालन और शुरुआती खेती करने वाले समुदाय सक्रिय रहे हैं।
हालांकि ये अवलोकन काफी आशाजनक हैं, लेकिन पुरातत्वविदों के अनुसार ये निष्कर्ष अभी शुरुआती चरण में ही हैं। कोई भी निश्चित कालानुक्रमिक, सांस्कृतिक या प्रवासन से जुड़े संबंध सही-सही स्थापित करने से पहले, व्यापक और गहन शोध, गुफा स्थलों की व्यवस्थित खोजबीन और वैज्ञानिक खुदाई करना बेहद जरूरी है।
कहना न होगा कि यह खोज सिक्किम के बौद्ध-पूर्व और प्रागैतिहासिक अतीत को समझने में एक नया अध्याय खोलती है। यह पूर्वी हिमालयी क्षेत्र, पूर्वोत्तर भारत की जीवंत जनजातीय परंपराओं और पूर्वी नेपाल की किराता विरासत के बीच गहरे सांस्कृतिक संबंधों की संभावना को और मजबूत करती है। ऐसे में, इस स्थल के संरक्षण और वैज्ञानिक जांच के लिए स्थानीय समुदायों, विरासत विशेषज्ञों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को शामिल करते हुए साझा अध्ययन की योजना बनाई जा रही है।
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