गंगटोक : गंगटोक के चिंतन भवन में आयोजित तकनीक एवं न्यायिक शिक्षा पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन आज न्यायिक प्रशासन में ब्लॉकचेन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उभरती तकनीकों को शामिल करने पर गहन चर्चा हुई।
पहले सम्मेलन में देश भर आए मुख्य न्यायाधीश, कंप्यूटर समिति के अध्यक्ष और केंद्रीय परियोजना समन्वयक शामिल हुए। इसके तहत, ‘न्यायिक प्रशासन के लिए ब्लॉकचेन क्यों?’ विषयक तीसरे सत्र की अध्यक्षता केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सौमेन सेन और सह-अध्यक्षता हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जीएस संधावालिया ने की। इस सत्र में कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति देबांगसु बसाक, झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद सेन और सिक्किम के महाधिवक्ता बसावा प्रभु एस पाटिल ने पैनल चर्चा में भाग लिया।
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुमन श्याम द्वारा संचालित इस सत्र में केरल उच्च न्यायालय के केंद्रीय परियोजना समन्वयक जोसेफ राजेश केए चर्चाकार के रूप में शामिल हुए। इसमें न्यायिक प्रशासन में मौजूद चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया। इनमें मैनुअल रजिस्टर, फाइल ट्रैकिंग सिस्टम, प्रक्रिया सेवा लॉग और साक्ष्य अभिरक्षा तंत्र पर निर्भरता शामिल रहे, जो अक्सर समय लेने वाले होते हैं और जिनमें छेड़छाड़ की गुंजाइश रहती है।
विशेषज्ञों ने बताया कि ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी अपरिवर्तनीय टाइम-स्टैम्पिंग, वितरित सत्यापन प्रणाली, छेड़छाड़-रोधी रिकॉर्ड और स्वचालित ऑडिट ट्रेल्स के माध्यम से समाधान प्रदान करती है। इससे अदालती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, दक्षता और विश्वसनीयता बढ़ती है।
वहीं, ‘एआई को सबसे पहले सुरक्षित रूप से कहां लागू किया जा सकता है?’ शीर्षक के चौथे सत्र की अध्यक्षता गुजरात उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश श्रीमती न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल और सह-अध्यक्षता मणिपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम सुंदर ने की। इस पैनल में गुवाहाटी हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति माइकल जोथांखुमा, राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति डॉ पुष्पेंद्र सिंह भाटी और गुजरात हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति निखिल एस करियल शामिल थे। इसका संचालन पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अनूप चितकारा ने किया, जबकि केरल के पथानामथिट्टा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट डॉ. जॉन वर्गीस ने इसमें चर्चाकर्ता की भूमिका निभाई।
इस सत्र में हुई चर्चाओं का मुख्य केंद्र न्यायिक प्रणालियों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को सुरक्षित और चरणबद्ध तरीके से लागू करना था। यह देखा गया कि एआई का उपयोग रजिस्ट्री कार्यों, केस-फ्लो प्रबंधन, फाइलिंग की जांच, दस्तावेजों के रखरखाव, सुनवाई की समय-सारिणी तय करने और गवाहों के बयानों को रिकॉर्ड करने जैसे कार्यों में प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। इसके साथ ही, प्रतिभागियों ने न्यायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में एआई के विस्तार को लेकर सावधानी बरतने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, और इस बात को पुन: दोहराया कि न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया में मानवीय विवेक (निर्णय क्षमता) ही सर्वोपरि है।
चर्चाओं से इस बात पर आम सहमति बनी कि यद्यपि प्रौद्योगिकी में परिवर्तनकारी क्षमता है, फिर भी इसे अपनाते समय निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए, ताकि न्यायिक प्रणाली के मूल मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।
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