गंगटोक : ज्ञान भारतम मिशन के लिए पहली राज्य स्तरीय स्थायी समिति की बैठक आज ताशीलिंग सचिवालय में मुख्य सचिव आर. तेलंग की अध्यक्षता में आयोजित की गई। इस बैठक में सिक्किम में जारी पांडुलिपि सर्वेक्षण की प्रगति और रणनीतिक ढांचे की समीक्षा की गई, जिसमें जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन, अंतर-विभागीय समन्वय और जनसंपर्क को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
बैठक में नामग्याल इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्बतोलॉजी के निदेशक डॉ पासांग फेम्पु, धार्मिक मामलों के सचिव केसांग रेचुंग, संस्कृति सचिव बीके लामा, स्कूली शिक्षा सचिव ताशी चोफेल, वरिष्ठ गेंडरुंग टी थेनडुप भूटिया, वरिष्ठ परीक्षण अधिकारी एलएन शर्मा और नामग्याल इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्बतोलॉजी से कर्मा शेराप भूटिया ने भाग लिया। वहीं, सभी जिलों के जिला कलेक्टरों ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से इसमें भाग लिया।
बैठक के दौरान, मुख्य सचिव ने जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने पांडुलिपियों की पहचान को आसान बनाने के लिए ‘हर घर दस्तक’ दृष्टिकोण का लाभ उठाने का प्रस्ताव रखा। वहीं, समन्वय पर जोर देते हुए उन्होंने नामग्याल इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्बतोलॉजी, धार्मिक मामलों के विभाग, स्कूली शिक्षा विभाग और संस्कृति विभाग से सर्वेक्षण के प्रभावी निष्पादन के लिए निकट समन्वय में काम करने का भी आह्वान किया।
बैठक में, समिति ने दोहराया कि तीन-सूत्रीय दृष्टिकोण-परिरक्षण, संरक्षण और डिजिटलीकरण-द्वारा निर्देशित पांडुलिपि विरासत का संरक्षण मुख्य उद्देश्य बना हुआ है। वहीं, इसके लिए ज्ञान भारतम मिशन और राज्य सरकार के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन के अनुरूप परिचालन दिशा निर्देशों पर भी चर्चा की गई। इसके अलावा, सर्वेक्षण प्रक्रिया में पहुंच और व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु सामुदायिक नेताओं की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया गया।
इस चर्चा में जिला कलेक्टरों के अपने बहुमूल्य सुझाव रखे, जिन्होंने जमीनी वास्तविकताओं के आधार पर जमीनी स्तर के दृष्टिकोण और व्यावहारिक सुझाव साझा किए।
उल्लेखनीय है कि 16 मार्च से 15 जून तक निर्धारित राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण 2026, एक राष्ट्रव्यापी पहल है जिसका उद्देश्य पूरे भारत में पांडुलिपि विरासत की व्यवस्थित रूप से पहचान, दस्तावेजीकरण और उन्हें संरक्षित करना है। यह सर्वेक्षण ज्ञान भारतम मिशन के तहत राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के समन्वय से लागू किया जा रहा है, जो प्रशासनिक दक्षता, क्षेत्रीय अनुकूलन क्षमता और एक समान डेटा संग्रह प्रथाओं को सुनिश्चित करता है। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य पूरे देश में पांडुलिपियों के वितरण और स्थिति की एक व्यापक समझ विकसित करना है, जिससे उनके संरक्षण, डिजिटलीकरण और विद्वानों की पहुँच से संबंधित भविष्य की पहलों की नींव रखी जा सके।
यह मिशन उन पांडुलिपियों पर केंद्रित है जो ताड़ के पत्तों, भोजपत्र, कपड़े, कागज और धातु जैसी सामग्रियों पर हाथ से लिखी गई रचनाएं हैं। इस सर्वेक्षण के अंतर्गत शामिल होने के लिए, किसी भी पांडुलिपि का कम से कम 75 वर्ष पुराना होना और उसका ऐतिहासिक, वैज्ञानिक या सौंदर्यपरक महत्व होना अनिवार्य है।
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