नई दिल्ली । आम आदमी पार्टी (आप) के भीतर पिछले एक महीने से जो हलचल दबे सुरों में चल रही थी, वह शुक्रवार सुबह खुलकर सामने आ गई। पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने बीजेपी में मर्जर के दस्तावेज राज्यसभा चेयरमैन को सौंप दिए। यह सिर्फ दल-बदल नहीं, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक पटकथा है जिसकी तैयारी लंबे समय से पर्दे के पीछे चल रही थी।
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम की कमान राघव चड्ढा के हाथ में थी। बताया जा रहा है कि पिछले एक महीने में अलग-अलग समय पर एक एक कर सांसदों की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात हुई थी। इन बैठकों को बेहद गोपनीय रखा गया। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने इनका स्वागत करने की बात बैठकों में कही।
शुक्रवार सुबह ठीक 11 बजे वह क्षण आया, जब राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने खुद हस्ताक्षरित दस्तावेज राज्यसभा चेयरमैन को सौंपे। यह दस्तावेज सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थे, बल्कि आम आदमी पार्टी की संसदीय राजनीति में सबसे बड़े भूकंप का संकेत थे।
एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत सदस्यता बचाने के लिए दो-तिहाई संख्या जरूरी थी। आप के कुल 10 राज्यसभा सांसद हैं, इसलिए कम से कम 7 सांसदों का साथ होना अनिवार्य था। यही वजह थी कि इस पूरी कवायद में संख्या सबसे बड़ा हथियार भी थी और सबसे बड़ा जोखिम भी।
सूत्र बताते हैं कि यदि इनमें से एक भी सांसद अंतिम समय में पीछे हटता, तो बाकी छह सांसदों की सदस्यता खतरे में पड़ सकती थी। इसी वजह से रणनीति बनाने वालों ने सात पर नहीं, बल्कि आठ सांसदों को साथ रखने की कोशिश की।
पंजाब से राज्यसभा सांसद बाबा बलवीर सिंह सीचेवाल को मनाने के लिए कई दौर की कोशिश हुई। उन्हें साथ लाने की कोशिश इसलिए भी की गई ताकि संख्या का जोखिम खत्म हो सके। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद वे पार्टी से बगावत के लिए तैयार नहीं हुए। यही वजह रही कि आखिरी समय तक बेचैनी बनी रही। सूत्रों के मुताबिक, जब तक सातों सांसदों के दस्तखत पक्के नहीं हो गए, तब तक पूरी टीम बेहद सतर्क रही।
इन सात सांसदों में तीन पुराने पार्टी कार्यकर्ता रहे हैं और चार उद्योगपति हैं। पुराने कार्यकर्ताओं में राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल के असंतोष की चर्चा पहले से थी। लेकिन संदीप पाठक का नाम सामने आना पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। संदीप पाठक दिल्ली चुनाव में संगठन के सबसे अहम चेहरों में थे। लेकिन चुनाव हारने के बाद उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं मिला। सूत्र बताते हैं कि इसी दौरान उनकी नाराजगी गहराती गई। कुछ दिन पहले उन्हें बंगला आवंटित हुआ और इसी दौर में उनकी बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात भी हुई थी।
अशोक मित्तल का नाम भी इस कहानी में अहम है। लगभग 10 दिन पहले उनके घर और प्रतिष्ठानों पर ईडी की रेड हुई थी। दिलचस्प बात यह रही कि इससे कुछ दिन पहले ही उन्हें राघव चड्ढा की जगह राज्यसभा में पार्टी का उपनेता बनाया गया था। राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को संयोग से ज्यादा संकेत माना जा रहा है। अब वही अशोक मित्तल इस बड़े राजनीतिक बदलाव का हिस्सा बन गए हैं।
परदे के पीछे महीनों से चल रही नाराजगी, गुप्त बैठकें, कानूनी गणित और सत्ता समीकरण इन सबने मिलकर वह पटकथा लिखी, जिसने शुक्रवार को भारतीय राजनीति में नया मोड़ दे दिया। राघव चड्ढा और आप नेतृत्व के बीच दूरी 2024 से बढ़नी शुरू हुई, जो उनकी लगातार चुप्पी, चुनावी निष्क्रियता और पार्टी गतिविधियों से दूरी में साफ दिखी। राज्यसभा में उपनेता पद से हटाए जाने के बाद यह दरार खुलकर सामने आई और अंततः यही असंतोष बड़े राजनीतिक बदलाव की वजह बना।
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