नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने नौकरियों में नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने सोमवार को कहा कि केवल ऊंची शैक्षणिक डिग्री होने से कोई उम्मीदवार नौकरी के लिए तब तक पात्र नहीं हो जाता, जब तक वह भर्ती और पदोन्नति नियमों के तहत जरूरी अनुभव की शर्त को पूरा न करता हो।
मामले में जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदूड़ की बेंच ने हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड में कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर के पद पर की गई भर्ती प्रक्रिया में खामी पाई। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई उम्मीदवार बुनियादी योग्यता या अनुभव की शर्त पूरी नहीं करता, तो उसे सिर्फ ऊंची डिग्री होने या मेरिट में ऊपर होने के आधार पर योग्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि भर्ती नियमों में अनुभव की जो आवश्यकता तय की गई है, उसे ऊंची डिग्री से बदला नहीं जा सकता। ऐसा करना न्यूनतम योग्यता को प्राथमिकता वाली योग्यता से बदलने जैसा होगा, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता।
यह मामला एक ऐसी उम्मीदवार के चयन से जुड़ा था, जिसके पास आवेदन के समय केवल एक साल का कार्य अनुभव था। जबकि भर्ती नियमों के अनुसार, कंप्यूटर मैन्युफैक्चरिंग या मेंटेनेंस में कम से कम पांच साल का अनुभव होना अनिवार्य था। हालांकि, उस उम्मीदवार के पास ‘इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन’ में एमटेक की डिग्री थी, जिसे नियमों में वरीयता वाली योग्यता माना गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एमटेक की डिग्री का उपयोग अनुभव की कमी को पूरा करने या अनिवार्य शर्तों में ढील देने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने चयन प्रक्रिया को दोषपूर्ण बताते हुए कहा कि इसमें अनिवार्य योग्यता और वरीयता वाली योग्यता के बीच के अंतर को समझने में गलती की गई है।
अदालत ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अदालतों को नियुक्ति के निर्देश देने में सावधानी बरतनी चाहिए। जब चयन प्रक्रिया की जड़ में ही पात्रता का अभाव हो, तो ऐसी नियुक्ति को बरकरार नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पांच साल का अनुभव एक विशेष प्रकार की योग्यता है, जिसे नौकरी मिलने के बाद हासिल नहीं किया जा सकता। इसलिए, नियमों के खिलाफ की गई ऐसी नियुक्ति पूरी तरह अवैध है और इसे रद्द करना ही सही कदम है। सुप्रीम कोर्ट ने अंत में कहा कि उम्मीदवार का चयन और नियुक्ति कानून की नजर में सही नहीं ठहराई जा सकती।
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