न्यायिक प्रक्रियाओं के साथ तकनीक को एकीकृत करना जरूरी : राज्यपाल

गंगटोक : सिक्किम में तकनीक और न्यायिक शिक्षा पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आज चिंतन भवन में अंतिम समापन सत्र के साथ संपन्न हो गया।

न्यायिक प्रणालियों और कानूनी शिक्षा को सुदृढ़ बनाने में टेक्नोलॉजी की भूमिका पर विचार-विमर्श हेतु आयोजित इस दो-दिवसीय सम्मेलन में आज चिंतन भवन और सम्मान भवन में एक साथ दो कॉन्फ्रेंस हुए। इनमें न्यायपालिका सदस्यों, कानूनी विशेषज्ञों और देश-विदेश से आए प्रतिनिधिगण शामिल हुए।

आज समापन सत्र में सिक्किम के राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। यहां अपने संबोधन में राज्यपाल ने कानूनी शिक्षा और न्यायिक प्रक्रियाओं के साथ तकनीक को एकीकृत करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हुए समावेशिता तथा सुलभता सुनिश्चित करने की बात कही। उन्होंने सम्मेलन को “लोकतंत्र के मूलभूत स्तंभों में से एक-न्यायपालिका-को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम” बताते हुए राज्य के प्रगतिशील दृष्टिकोण को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूरे सम्मेलन के दौरान हुए विचार-विमर्श इस बात को दर्शाते हैं कि न्यायिक प्रणालियों को तीव्र तकनीकी प्रगति के साथ तालमेल बिठाना कितना महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

राज्यपाल ने इस बात पर जोर दिया कि डिजिटल उपकरणों को अपनाना केवल एक प्रशासनिक उन्नयन नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक परिवर्तन है जिसका उद्देश्य न्याय वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी, कुशल और सुलभ बनाना है। ई-प्रक्रियाओं, पेपरलेस अदालतों, डिजिटल अभिलेखों, ई-फाइलिंग, हाइब्रिड अदालत मॉडलों और कार्यवाही के सीधे प्रसारण जैसे नवाचारों का उल्लेख करते हुए, राज्यपाल ने कहा कि ये पहलें पूरे देश में न्यायिक प्रशासन को एक नई परिभाषा दे रही हैं। उन्होंने आगे कहा कि सिक्किम ने ‘डिजिटल इंडिया’ की व्यापक परिकल्पना के अनुरूप देश की पहली पूर्णत: पेपरलेस न्यायपालिका बनने की दिशा में कार्य शुरू कर दिया है। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डिजिटल प्रबंधन प्रणालियों की बढ़ती भूमिका पर भी जोर दिया और उन्हें न्यायिक संस्थानों को जटिल कानूनी चुनौतियों, खासकर बदलते साइबर परिदृश्य, से निपटने के लिए तैयार करने हेतु अनिवार्य बताया।

इसके साथ ही, उन्होंने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि तकनीकी प्रगति के कारण सुलभता से कोई समझौता न हो। वहीं, अपने प्रमुख सुझावों में राज्यपाल ने न्यायिक कार्यवाही में स्थानीय भाषाओं के अधिक उपयोग की वकालत की। उन्होंने कहा कि अनुवादकों और आधुनिक अनुप्रयोगों की सहायता से ऐसा करके इस प्रणाली को नागरिकों के लिए अधिक सुगम और अनुकूल बनाया जा सकता है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अदालती कार्यवाही के दुरुपयोग के प्रति भी आगाह किया और न्यायिक निर्णयों से संबंधित गलत सूचना और दुष्प्रचार का मुकाबला करने के लिए सुरक्षा उपायों और कड़े कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता बतायी।

राज्यपाल ने प्रक्रियात्मक दक्षता पर प्रकाश डालते हुए इस बात पर जोर दिया कि तत्काल न्यायिक आदेश, जिनमें जमानत के निर्देश भी शामिल हैं, अधीनस्थ अदालतों तक तुरंत पहुंचाए जाने चाहिए ताकि उनका शीघ्र कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सके। उन्होंने युवा वकीलों को उनके पेशेवर विकास में सहायता के लिए न्यायिक निर्णयों तक मुफ्त पहुंच प्रदान किए जाने का भी सुझाव दिया।

सम्मेलन में श्रीलंका के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एएचएमडी नवाज ने अपने विशेष संबोधन में भारत और श्रीलंका के बीच गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ये संबंध केवल भौगोलिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें साझा सांस्कृतिक प्रभाव, परंपराएं और ऐतिहासिक आख्यान भी शामिल हैं, जो दोनों राष्ट्रों के बीच संबंधों को लगातार मजबूत कर रहे हैं।

वहीं, न्यायाधीश नवाज ने पूरे कॉमनवेल्थ देशों से आए न्यायपालिका सदस्यों को एक मंच पर लाने की इस पहल की सराहना करते हुए इसे विचारों के आदान-प्रदान और मिलकर सीखने के लिए एक अत्यंत मूल्यवान मंच बताया। उन्होंने आगे कहा कि कानूनी और न्यायिक पेशे एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं। साथ ही, उन्होंने नए उपकरणों और प्रौद्योगिकियों को अपनाने में गहन विचार-विमर्श और सावधानी बरतने का सुझाव दिया। उन्होंने आगे कहा कि अपनी अनूठी भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थिति के कारण सिक्किम इस तरह की चर्चाओं के लिए एक आदर्श स्थल साबित हुआ है, जहां विविध दृष्टिकोण और विचार एक साथ मिल सके हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस सम्मेलन के परिणाम, भविष्य में न्यायिक सुधार और नवाचार की दिशा में किए जाने वाले प्रयासों को निरंतर मार्गदर्शन प्रदान करते रहेंगे।

कार्यक्रम में कॉमनवेल्थ लीगल एजुकेशन एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) एस शिवकुमार ने सम्मेलन के इन दो दिनों में हुई चर्चाओं को न्याय वितरण प्रणाली में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाने वाला बताते हुए कहा कि ये विचार-विमर्श केवल डिजिटलीकरण तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इनका मुख्य ध्यान व्यापक संस्थागत परिवर्तन पर था, जहां तकनीक का उपयोग पहुंच, दक्षता और पारदर्शिता को सार्थक रूप से बेहतर बनाने के लिए किया जाता है।

हालांकि, डॉ. शिवकुमार ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यक पर भी जोर दिया-जहां तकनीक न्यायिक कार्यों में सहायता तो करे, लेकिन वह मानवीय निर्णय क्षमता का स्थान न ले। उन्होंने इन परिवर्तनों के अनुरूप ढलने में न्यायिक शिक्षा के महत्व को भी रेखांकित किया और कहा कि सीखने की प्रणालियों को इस तरह विकसित होना चाहिए कि वे कानूनी ज्ञान को तकनीकी समझ के साथ एकीकृत कर सकें।

कार्यक्रम में सिक्किम उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भास्कर राज प्रधान ने भी इस सम्मेलन को एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक बताते हुए कहा कि इन दो दिनों में हुई चर्चाओं से विविध और सार्थक दृष्टिकोण सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि यद्यपि इन सत्रों में विचारों की एक विस्तृत श्रृंखला देखने को मिली, लेकिन इनका समग्र निष्कर्ष स्पष्ट था। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि न्याय की प्रभावी और त्वरित सुनिश्चितता के लिए निरंतर सुधारों की अत्यंत आवश्यकता है।

प्रधान के अनुसार, देश-विदेश से आए न्यायाधीशों, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों के बीच विचारों का यह आदान-प्रदान भारतीय न्यायपालिका और व्यापक कॉमनवेल्थ न्यायिक समुदाय के निरंतर विकास की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। उन्होंने न्याय वितरण प्रणाली की बदलती प्रकृति पर बल देते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी अब केवल एक प्रशासनिक उपकरण मात्र नहीं रह गई है, बल्कि यह न्यायिक अवसंरचना का एक अभिन्न अंग बन चुकी है।

सम्मेलन में सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ए मुहम्मद मुस्ताक ने भी वक्तव्य रखा। उन्होंने उम्मीद जतायी कि यह सम्मेलन एक अधिक गतिशील, प्रौद्योगिकी-सक्षम और जन-केंद्रित न्यायिक प्रणाली के निर्माण की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम होने के नाते सदैव स्मरण किया जाएगा।

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