गंगटोक : सिक्किम की पर्यावरण संरक्षण संस्था अफेक्टेड सिटिजन्स ऑफ तीस्ता (एसीटी) 24 जुलाई से चार दिवसीय तीस्ता राइट्स पदयात्रा की शुरुआत करेगी। इस पदयात्रा का उद्देश्य संगठन के 19 वर्षों के पर्यावरण आंदोलन को चिह्नित करना तथा तीस्ता नदी के संरक्षण के लिए अपने अभियान को नए सिरे से आगे बढ़ाना है।
पदयात्रा से पूर्व मीडिया को संबोधित करते हुए पर्यावरण कार्यकर्ता Gyatso Lepcha ने कहा कि यह पहल नदी संरक्षण के लिए संगठन के लगभग दो दशक लंबे संघर्ष को समर्पित है। साथ ही, यह उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि भी है जिन्होंने इस आंदोलन में संगठन का साथ दिया और अब इस दुनिया में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यह पदयात्रा हमारे 19 वर्षों के संघर्ष का उत्सव है। यह उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि भी है जिन्होंने इस आंदोलन में हमारा साथ दिया और अब हमारे बीच नहीं हैं। साथ ही, यह तीस्ता नदी की जीवंत भावना का भी उत्सव है।
ग्याछो लेप्चा ने इसे ऐतिहासिक पहल बताते हुए कहा कि संभवतः सिक्किम के इतिहास में यह पहला अवसर होगा, जब किसी समुदाय द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए इस प्रकार की पदयात्रा आयोजित की जा रही है। उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि हमारे राज्य के इतिहास में किसी समुदाय ने पर्यावरण के लिए इस तरह की पदयात्रा आयोजित की है। यह एक ऐतिहासिक पहल साबित होगी। यह पदयात्रा जोंगू के फिदांग गांव से शुरू होगी, जो तीस्ता स्टेज-5 जलविद्युत परियोजना से प्रभावित क्षेत्र है। चार दिनों की यात्रा के बाद इसका समापन तीस्ता और रंगीत नदियों के संगम पर होगा।
मौसम की स्थिति के अनुसार प्रतिभागी यात्रा के दौरान दीक्चू, सिंगताम, रंगपो और मल्ली में रात्रि विश्राम करेंगे। इस अभियान के माध्यम से एसीटी अपनी लंबे समय से चली आ रही मांगों को दोहराएगा। इनमें तीस्ता स्टेज-4 जलविद्युत परियोजना तथा प्रस्तावित 280 मेगावाट पनन जलविद्युत परियोजना को रद्द करने की मांग प्रमुख है। संगठन सिक्किम सरकार से यह भी आग्रह करेगा कि तीस्ता स्टेज-5 और तीस्ता स्टेज-3 के बीच तीस्ता नदी के पूरे हिस्से तथा रोंगयोंग नदी को रिवर सैंक्चुअरी घोषित किया जाए। एसीटी की एक अन्य प्रमुख मांग यह है कि तीस्ता बेसिन में संचालित और प्रस्तावित सभी जलविद्युत परियोजनाओं, जिनमें प्रस्तावित तीस्ता स्टेज-6 परियोजना भी शामिल है, के लिए नए सिरे से ईआईए तथा एसआईए कराया जाए।
ग्याछो लेप्चा ने कहा कि ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड के बाद तीस्ता नदी बेसिन की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों में व्यापक बदलाव आ चुका है, जिससे पहले किए गए पर्यावरणीय अध्ययन अब वर्तमान स्थिति का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते। उन्होंने कहा कि जीएलओएफ के बाद पूरा तीस्ता नदी बेसिन बदल गया है। पहले किए गए पर्यावरणीय अध्ययन अब मौजूदा परिस्थितियों को नहीं दर्शाते। इसलिए किसी भी निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने से पहले नए सिरे से आकलन कराया जाना आवश्यक है। मानसून के दौरान, जब सिक्किम के कई हिस्से बाढ़ जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं, ऐसे समय में पदयात्रा आयोजित करने संबंधी प्रश्न पर लेप्चा ने कहा कि इसका समय जानबूझकर चुना गया है।
उन्होंने कहा कि यही वह समय है जब लोग नदी की वास्तविक स्थिति को देख सकते हैं और उसके महत्व को समझ सकते हैं। सर्दियों में लोग इन मुद्दों को भूल जाते हैं। हमारा मानना है कि अपनी चिंताओं को सामने रखने के लिए यही सबसे उपयुक्त समय है। चार दिवसीय पदयात्रा पूरी होने के बाद एसीटी सिक्किम सरकार को एक ज्ञापन सौंपेगा। यदि संभव हुआ तो यह ज्ञापन राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री को भी सौंपा जाएगा। इसके माध्यम से संगठन तीस्ता नदी के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाने तथा राज्य की सभी जलविद्युत परियोजनाओं की व्यापक समीक्षा कराने की मांग करेगा।
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