‘सिक्किम का विलय स्वीकार नहीं’, पवन चामलिंग ने सरकार से मांगा विशेष सत्र

कहा- राज्य की संवैधानिक और भौगोलिक स्थिति बरकरार रखने का प्रस्ताव केंद्र को भेजे सरकार

गंगटोक : सिक्किम-दार्जिलिंग विलय और प्रस्तावित उत्तर बंगाल राज्य में सिक्किम के कुछ भूभागों को शामिल करने की चर्चाओं के बीच सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री पवन चामलिंग ने राज्य की एसकेएम सरकार से तत्काल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि विधानसभा में सिक्किम की वर्तमान संवैधानिक और भौगोलिक स्थिति को यथावत रखने तथा किसी भी परिस्थिति में सिक्किम का दार्जिलिंग या उत्तर बंगाल के साथ विलय नहीं करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाना चाहिए।

चामलिंग ने कहा कि यदि सरकार इस दिशा में कदम नहीं उठाती है तो अंतिम विकल्प सिक्किम की जनता के पास रहेगा। उन्होंने सिक्किम-दार्जिलिंग विलय की अवधारणा को पूरी तरह खारिज करते हुए दावा किया कि ऐसा कदम दोनों क्षेत्रों की जनता के साथ अन्याय होगा।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि दार्जिलिंग की जनता लंबे समय से अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर संघर्ष कर रही है। इस आंदोलन में लोगों ने अनेक त्याग और बलिदान दिए हैं। ऐसे में गोर्खालैंड की मूल मांग से हटकर कोई अन्य राजनीतिक व्यवस्था थोपना दार्जिलिंग की जनता की आकांक्षाओं के साथ विश्वासघात होगा। उन्होंने कहा कि सिक्किम की जनता ने हमेशा दार्जिलिंग की गोर्खालैंड मांग को राजनीतिक और नैतिक समर्थन दिया है, लेकिन इसका अर्थ सिक्किम-दार्जिलिंग एकीकरण अथवा सिक्किम को प्रस्तावित उत्तर बंगाल राज्य में शामिल करने के प्रस्ताव का समर्थन करना नहीं है।

चामलिंग ने कहा कि सिक्किम और दार्जिलिंग, दोनों क्षेत्रों की जनता की भावनाओं और विचारों का सम्मान किया जाना चाहिए। सिक्किम की विशेष पहचान, संवैधानिक सुरक्षा और राजनीतिक अधिकारों को किसी भी परिस्थिति में प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सिक्किम ने अपना देश देकर लोकतांत्रिक व्यवस्था प्राप्त की है। इसलिए राज्य की ऐतिहासिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

वहीं, दार्जिलिंग के स्थायी राजनीतिक समाधान को लेकर चल रही बहस पर चामलिंग ने कहा कि वह गोर्खालैंड की मांग का समर्थन अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान भी करते रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि 29 जनवरी 2011 को तत्कालीन एसडीएफ सरकार ने गोर्खालैंड के समर्थन में विधानसभा में सरकारी प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। उन्होंने इसे गोर्खालैंड के संबंध में पहला संवैधानिक प्रस्ताव होने का दावा किया।

चामलिंग ने यह भी दावा किया कि उनके मुख्यमंत्री रहते केंद्र सरकार की ओर से सिक्किम और दार्जिलिंग के एकीकरण का प्रस्ताव आया था, लेकिन उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया था। उनके अनुसार, उन्होंने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठकों में भी कई बार गोर्खालैंड की मांग उठाई थी।

पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए सिक्किम और दार्जिलिंग के बीच ऐतिहासिक संबंधों को प्रभावित करने तथा दोनों क्षेत्रों की जनता के बीच अविश्वास पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में, उन्होंने नेपाली समुदाय के भीतर विभाजन और जातीय तनाव उत्पन्न करने की कथित कोशिशों पर भी चिंता जताई।

चामलिंग ने इन गतिविधियों को एक सुनियोजित साजिश करार देते हुए सिक्किम और दार्जिलिंग की जनता से संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों पर सतर्क रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि दोनों क्षेत्रों को राजनीतिक टकराव का केंद्र बनाने के बजाय उनकी अलग-अलग पहचान, अधिकारों और जनभावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

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