जीएलओएफ से निपटने को सिक्किम में वैज्ञानिक तैयारियां तेज

एक दिवसीय मीडिया संवेदीकरण कार्यशाला में विस्तार से दी गई जानकारी

गंगटोक : सिक्किम में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) के खतरे से निपटने के लिए राज्य सरकार ने वैज्ञानिक अध्ययन, जोखिम आकलन, अर्ली वार्निंग सिस्टम और संरचनात्मक उपायों पर विशेष जोर दिया है। गुरुवार को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सम्मेलन कक्ष में आयोजित एक दिवसीय मीडिया संवेदीकरण कार्यशाला में बताया गया कि राज्य में 40 झीलों की पहचान हाई-हैजर्ड झीलों के रूप में की गई है। इनमें 16 झीलें श्रेणी-ए की हैं, जिन्हें सबसे अधिक संवेदनशील माना गया है। दो झीलें श्रेणी-बी, नौ श्रेणी-सी में हैं, जबकि 13 झीलें अभी अवर्गीकृत हैं।

मुख्यमंत्री के प्रेस सचिव योगेन तमांग ने कहा कि जीएलओएफ जोखिम न्यूनीकरण से जुड़े वैज्ञानिक उपायों की जानकारी मीडिया तक पहुंचाना जरूरी है, ताकि अटकलों और अपुष्ट सूचनाओं के बजाय आम लोगों तक सत्यापित जानकारी पहुंच सके। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग के नेतृत्व में फरवरी 2025 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग को राज्य में जीएलओएफ खतरे के आकलन और जोखिम न्यूनीकरण अध्ययन के लिए नोडल विभाग बनाया गया था। इसके तहत विभिन्न संबंधित विभागों के समन्वय से बहु-विषयक अध्ययन किए जा रहे हैं।

उन्होंने विभाग की ओर से देश का पहला समर्पित जीएलओएफ रिस्क मिटिगेशन प्रोटोकॉल विकसित करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि यह प्रोटोकॉल सिक्किम के लिए संस्थागत तंत्र बनने के साथ ही हिमालयी राज्यों और ग्लेशियर आधारित आपदाओं से प्रभावित अन्य क्षेत्रों के लिए मॉडल बन सकता है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव डॉ संदीप ताम्बे ने बताया कि रिमोट सेंसिंग तकनीक और सैटेलाइट इमेजरी के माध्यम से ग्लेशियल झीलों के आकार और विस्तार में होने वाले बदलावों की निगरानी की जा रही है। संवेदनशील झीलों के लिए फील्ड स्टडी शुरू हो चुकी है। इसमें रिमोट सेंसिंग, डिस्चार्ज और जलस्तर अध्ययन, इलेक्ट्रिकल रेजिस्टिविटी टोमोग्राफी (ईआरटी), भू-भौतिकीय जांच, डीजीपीएस सर्वे, फ्लड मॉडलिंग, खतरे का आकलन, झील का जलस्तर कम करने और बाढ़ रोकने वाली संरचनाओं की व्यवहार्यता तथा बाथीमेट्रिक अध्ययन शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सभी ग्लेशियल झीलों के लिए एक जैसी रणनीति अपनाना संभव नहीं है। इसी वजह से ल्होनाक कॉम्प्लेक्स, शाको छो झील और गुरुडोंगमार कॉम्प्लेक्स के लिए अलग-अलग प्रस्ताव तैयार किए गए हैं।

शाको छो झील की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) को भेजी जा चुकी है। वहीं, ल्होनाक कॉम्प्लेक्स में मुगुथांग के पास डोलमा साम्पा में बाढ़-रोकथाम संरचना के लिए जल शक्ति मंत्रालय को प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट (पीपीआर) भेजी गई है। केंद्रीय जल आयोग विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से इसकी डीपीआर तैयार कर रहा है। गुरुदोंगमार कॉम्प्लेक्स के लिए झील के आउटलेट पर मोरेन प्लग वॉल बनाने का प्रस्ताव है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ब्रह्मपुत्र बोर्ड के सहयोग से इस प्रस्ताव पर काम कर रहा है, ताकि जीएलओएफ का खतरा कम करने के साथ झील की सांस्कृतिक और धार्मिक महत्ता को भी सुरक्षित रखा जा सके।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रधान निदेशक सह सचिव डीजी श्रेष्‍ठ ने कहा कि वर्ष 2023 में आए विनाशकारी जीएलओएफ से राज्य को भारी नुकसान हुआ था। भविष्य में ऐसी आपदाओं से राज्य को सुरक्षित रखने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम के साथ मजबूत बुनियादी ढांचे का विकास, सड़कों, बांधों, पुलों और आबादी की सुरक्षा तथा जीएलओएफ जोखिम न्यूनीकरण संबंधी परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।

उन्होंने बताया कि राज्य में हाइड्रो-मौसम विज्ञान, ईआरटी, बाथीमेट्रिक, हाइड्रोलॉजिकल और भू-वैज्ञानिक अध्ययन के साथ यूएवी आधारित भू-भाग मैपिंग की जा रही है। जीएलओएफ जोखिम के आकलन के लिए वैज्ञानिक प्रोटोकॉल तैयार करने तथा एचईसी-आरएएस सॉफ्टवेयर के जरिए बाढ़ के प्रवाह और संभावित रास्तों की मॉडलिंग की क्षमता विकसित की जा रही है।

झीलों का जलस्तर कम करने के लिए साइफनिंग, पंपिंग, मौजूदा चैनलों के विस्तार, कृत्रिम खुले चैनल, सुरक्षा दीवार के साथ मोरेन कटिंग और सुरंग निर्माण जैसे विकल्पों पर भी अध्ययन किया जा रहा है। जीएलओएफ जोखिम न्यूनीकरण के लिए चार चरणों-प्रारंभिक आकलन, व्यापक आकलन, न्यूनीकरण उपायों की डिजाइन और उनका क्रियान्वयन-पर आधारित रणनीति अपनाई जा रही है। उन्होंने बताया कि गृह मंत्रालय के सचिव गोविंद मोहन के साथ हुई बैठक के बाद राज्य में अतिरिक्त अर्ली वार्निंग सेंसर लगाने का प्रस्ताव भी रखा गया है। जीएलओएफ जोखिम न्यूनीकरण को राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ते हुए संस्थागत और तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के मुख्य अभियंता आशिम बसनेट ने जीएलओएफ मॉडलिंग और खतरे वाले क्षेत्रों के निर्धारण की प्रक्रिया की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि शाको छो राज्य की 16 उच्च जोखिम वाली झीलों में शामिल है और एनडीएमए द्वारा इसे श्रेणी-ए में रखा गया है। झील का कोई प्राकृतिक आउटलेट नहीं है और इसका मोरेन बांध अस्थिर तथा पारगम्य है। झील से करीब 13 किलोमीटर नीचे थांगू गांव स्थित होने के कारण जोखिम और बढ़ जाता है। अध्ययन में झील की गहराई और जल मात्रा का आकलन किया गया है। विकल्पों के विश्लेषण के बाद जलस्तर कम करने के लिए सोलर पंपों को व्यावहारिक विकल्प माना गया है। संरचनात्मक हस्तक्षेप को उपयुक्त नहीं माना गया, जबकि 20 मीटर से अधिक लिफ्ट हेड के कारण साइफन प्रणाली को भी व्यवहार्य नहीं पाया गया।

कार्यशाला में सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के विशेष सचिव सह निदेशक प्रवाकर राई ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। इस दौरान मीडिया प्रतिनिधियों और आपदा प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञों के बीच संवाद भी हुआ, जिसमें जीएलओएफ जोखिम, तैयारियों और वैज्ञानिक उपायों से जुड़े सवालों पर चर्चा की गई।

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