नई दिल्ली । मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासी विवाद और गहरा गया है। असदुद्दीन ओवैसी ने शनिवार को एसआईआर को ‘बैकडोर एनआरसी’ यानी पिछले दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करने की प्रक्रिया बताया। उन्होंने चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों, फैसलों पर असहमति और मतदाता सूचियों से नाम गायब होने को लेकर आयोग से कई सवाल पूछे। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आरोपों के बीच स्पष्ट किया कि एसआईआर से जुड़े सभी फैसले आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए हैं।
ओवैसी ने कहा कि उनकी पार्टी शुरुआत से ही अधिकारियों से कहती आ रही है कि यह प्रक्रिया पिछले दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू करने की दिशा में कदम है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने उन इलाकों में जनसांख्यिकीय बदलावों की जांच के लिए एक आयोग बनाया है, जहां राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की अंतिम सूची प्रकाशित हो चुकी है। इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश कर रहे हैं।
Asaduddin Owaisi ने कहा कि गृह मंत्री यह भी कह चुके हैं कि उस अंतिम सूची की समीक्षा की जाएगी। उनके मुताबिक, इससे उनकी आशंका को बल मिलता है कि आगे चलकर सरकार राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू कर सकती है और एसआईआर की प्रक्रिया को उसकी नींव के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि लोगों को फिर कतार में खड़ा किया जाएगा और उनसे दस्तावेज पेश करने के लिए कहा जाएगा।
ओवैसी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता सूचियों से नाम गायब होने के कारण लोगों को हो रही परेशानी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उनके क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग इस समस्या का सामना कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि एमआईएम की सहायता केंद्र के जरिए लोगों को ऑनलाइन अपना नाम जुड़वाने में मदद की जा रही है। ओवैसी ने कहा कि कई लोगों को यह तक पता नहीं चलता कि प्रारूप मतदाता सूची में उनका नाम नहीं है। जब उन्हें बताया जाता है कि उनका नाम गायब है तो वे कहते हैं, ‘लेकिन हम तो जिंदा हैं।’ उन्होंने कहा कि कई लोगों ने अपने माता-पिता और दादा-दादी से अपना संबंध साबित करने वाले दस्तावेज भी जमा किए हैं, इसके बावजूद उनके नाम सूची में नहीं आए। अब ऐसे लोग अपना नाम शामिल कराने के लिए प्रपत्र-6 के जरिए आवेदन कर रहे हैं।
ओवैसी ने प्रपत्र-6 में घोषणा देने की अनिवार्यता पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति प्रपत्र-6 भरता है तो उसे एक घोषणा देनी होती है और यह हिस्सा उनकी समझ से परे है। उन्होंने कहा कि अब इस मामले को अदालत में ले जाना भी संभव नहीं है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले को खारिज कर दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आगे क्या किया जाए। ओवैसी ने कहा कि उन्होंने उस समय भी बयान दिया था कि अगर चुनाव आयोग के भीतर ही किसी व्यक्ति को यह जानकारी नहीं है कि चीजें किस तरह संचालित हो रही हैं, तो देश के सामने इससे किस तरह का संदेश जा रहा है।
ओवैसी की टिप्पणी उस रिपोर्ट के बाद आई जिसमें चुनाव आयोग के भीतर एसआईआर से जुड़े फैसलों को लेकर कथित असहमति का दावा किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई, जो कथित तौर पर उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए थे।
ओवैसी ने कहा कि रिपोर्ट में जिन दो पत्रकारों ने यह जानकारी दी है, उसके अनुसार चुनाव आयुक्तों के बीच समन्वय की कमी दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि दो चुनाव आयुक्तों ने 14 मौकों पर असहमति के नोट दिए। इसके बाद ओवैसी ने सवाल उठाया कि यदि ऐसे असहमति के नोट दिए गए थे तो फिर सर्वसम्मत फैसला कैसे हुआ। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में सर्वसम्मत फैसला हुआ भी था या नहीं।
ओवैसी ने मंत्रिमंडलीय सचिव को भेजे गए पत्र को लेकर भी चुनाव आयोग से सवाल किया। उन्होंने कहा कि शिकायत में यह बात कही गई थी कि कुछ लोगों को अंधेरे में रखा जा रहा था और उनसे सलाह नहीं ली जा रही थी। ओवैसी ने सवाल किया कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है तो फिर मंत्रिमंडलीय सचिव को पत्र लिखने की जरूरत क्यों पड़ी। उन्होंने कहा कि यदि आयोग के मौजूदा स्पष्टीकरण को मान भी लिया जाए कि पत्र प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारी के कामकाज से संबंधित था, तो उस अधिकारी को हटाया जा सकता था। उन्होंने पूछा कि इसके लिए मंत्रिमंडलीय सचिव को पत्र लिखने की क्या जरूरत थी।
ओवैसी ने प्रपत्र-6 में कथित बदलाव को लेकर पूर्व चुनाव आयुक्तों के बयानों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि पूर्व चुनाव आयुक्तों के अनुसार चुनाव आयोग के पास प्रपत्र-6 में बदलाव करने का अधिकार नहीं है। इसके लिए कानून में संशोधन करना पड़ेगा और यह अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। ओवैसी ने कहा कि इस संबंध में कोई उल्लेख भी दिखाई नहीं देता।
ओवैसी ने चुनाव आयोग से एसआईआर से जुड़े फैसलों को सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने कहा कि आयोग को यह बताना चाहिए कि आखिर क्या निर्णय लिए गए। उनके मुताबिक, आयोग ने केवल यह कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न फैसले लिए गए और सब कुछ संतुलित था। ओवैसी ने सवाल किया कि वास्तव में कौन-कौन से फैसले लिए गए, इसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता।
ओवैसी ने उन लोगों का भी मुद्दा उठाया जिनके नाम अंतिम मतदाता सूची में नहीं दिखाई दिए। उन्होंने दावा किया कि करीब 10 करोड़ लोगों के नाम अंतिम मतदाता सूची में नहीं आए। उन्होंने सवाल किया कि अगर ये 10 करोड़ लोग अब प्रपत्र-6 के जरिए अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करते हैं तो आगे क्या होगा। पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हुए उन्होंने करीब 26 लाख लोगों का मुद्दा उठाया और कहा कि वहां अन्य राज्यों की तरह अभी न्यायाधिकरण या अदालत गठित नहीं की गई है। उन्होंने सवाल किया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम अंतिम एसआईआर सूची में आ गया, लेकिन उसका बेटा या बेटी अब 18 साल का हो गया है, तो ऐसी स्थिति में वह नया मतदाता क्या करेगा।
Asaduddin Owaisi ने मतदान केंद्र स्तर के अधिकारियों यानी बीएलओ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि हैदराबाद और तेलंगाना में यह देखने को मिला कि किसी मतदाता तक केवल नोटिस पहुंचाने में ही काफी समय लगा। उन्होंने बताया कि इन नोटिस में किसी व्यक्ति का नाम नोटिस में आने, किसी विसंगति, परिवार के साथ संबंध का मिलान नहीं होने, उम्र में अंतर या छह भाई-बहनों से जुड़ी जानकारी जैसी समस्याओं का उल्लेख था। ओवैसी ने कहा कि इन नोटिस को बांटने में ही काफी समय लग गया। उन्होंने दावा किया कि तेलंगाना में यदि कोई राजनीतिक दल अभी भी जमीन पर सक्रिय होकर नोटिस बांटने जैसे काम कर रहा है तो वह एमआईएम है।
ओवैसी ने मतदाता पंजीकरण अधिकारियों यानी ईआरओ की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि ईआरओ की शक्तियां कम कर दी गई हैं और अब वरिष्ठ अधिकारी ही निर्णय करेंगे। उन्होंने सवाल किया कि ऐसी स्थिति में ईआरओ के पास आखिर कितनी शक्ति बची है। ओवैसी ने कहा कि सुनवाई होगी और संभव हो तो ऑनलाइन होगी, जबकि असाधारण परिस्थितियों में ही ईआरओ इस संबंध में फैसला करेगा। उन्होंने सवाल किया कि ऐसी व्यवस्था व्यवहार में किस तरह काम करेगी।
ओवैसी ने तेलंगाना की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि वहां राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर नहीं था और स्थायी निवासी प्रमाणपत्र भी जारी नहीं किए गए थे। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने वहां मौजूद पारिवारिक रजिस्टरों को भी खारिज कर दिया और इसके लिए बिहार में सामने आई समस्याओं का हवाला दिया गया। ओवैसी ने सवाल किया कि ऐसी स्थिति में पूरी प्रक्रिया कैसे संचालित होगी और इसे लागू करना कैसे संभव होगा।
ओवैसी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब 2023-24 में संबंधित विधेयक संसद में पेश किया गया था, तब भी उन्होंने कहा था कि यदि सरकार इसी तरीके से मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन करेगी तो जनता की नजर में उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे। ओवैसी ने कहा कि उस समय उन्होंने जो आशंका जताई थी, वह अब सच साबित होती दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि चयन प्रक्रिया में कानून मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को शामिल किया गया है और उनके मुताबिक इससे 2:1 का अनुपात बनता है।
वहीं, चुनाव आयोग ने शनिवार को बैठक के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया आयोग की मंजूरी से शुरू की गई है। आयोग ने स्पष्ट किया कि एसआईआर के कार्यक्रम से जुड़े सभी फैसले आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए।मंत्रिमंडलीय सचिव को भेजे गए पत्र को लेकर भी चुनाव आयोग ने सफाई दी।
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