नई दिल्ली : केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को कहा कि कृषि शिक्षा की सफलता का आकलन केवल विश्वविद्यालयों से मिलने वाली डिग्रियों की संख्या से नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले ज्ञान, कौशल और किसानों के जीवन में आने वाले ठोस बदलाव से किया जाना चाहिए। उन्होंने कृषि शिक्षा को व्यावहारिक, प्रौद्योगिकी आधारित और किसानों की जरूरतों के अनुरूप बनाने का आह्वान किया।
चौहान ने नई दिल्ली में कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के 36वें वार्षिक सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए यह बात कही। ‘विकसित भारत 2047 के लिए कृषि उच्च शिक्षा की पुनर्कल्पना’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन 25 और 26 अगस्त को हो रहा है। इसमें देशभर के कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपति, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और शिक्षाविद कृषि शिक्षा को भविष्य के लिए तैयार करने को लेकर मंथन कर रहे हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालयों, आईसीएआर, कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके), किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), उद्योग और किसानों के बीच मजबूत सहयोग स्थापित कर अनुसंधान को प्रयोगशालाओं से खेतों तक पहुंचाना होगा। उन्होंने विश्वविद्यालयों से स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करने, समयबद्ध रोडमैप तैयार करने और परिणामों को मापने की व्यवस्था विकसित करने का आग्रह किया, ताकि कुलपतियों के प्रत्येक सम्मेलन से ठोस निर्णय निकल सकें।
कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए मजबूत कृषि क्षेत्र और सशक्त किसान आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि खाद्यान्न की कमी से आत्मनिर्भरता तक भारत की यात्रा किसानों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों और संस्थानों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। अब कृषि को तकनीक आधारित, नवाचारपूर्ण और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना अगली प्राथमिकता होनी चाहिए।
उन्होंने कृषि विश्वविद्यालयों से शिक्षा और अनुसंधान को किसानों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने तथा आधुनिक तकनीक, अनुसंधान, उद्यमिता और कृषि व्यवसाय के माध्यम से युवाओं के लिए नए अवसर पैदा करने का आह्वान किया। राज्य मंत्री राम नाथ ठाकुर ने कृषि को मजबूत बनाने और किसानों को सशक्त करने को विकसित भारत के लक्ष्य के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने कृषि शिक्षा के आधुनिकीकरण, नवाचार और युवाओं को नई चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक ज्ञान एवं कौशल उपलब्ध कराने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अनुसंधान और शिक्षा का सीधा संबंध किसानों की जरूरतों से होना चाहिए और वैज्ञानिक उपलब्धियों को खेत स्तर पर व्यावहारिक समाधान में बदला जाना चाहिए।
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कृषि उच्च शिक्षा में व्यापक बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक डिग्री आधारित व्यवस्था को कौशल, नवाचार और भविष्य की जरूरतों पर आधारित इकोसिस्टम में बदलना होगा। उन्होंने उद्योग-अकादमिक साझेदारी, मांग आधारित अनुसंधान, मजबूत मान्यता व्यवस्था और डेटा आधारित निर्णय लेने की प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत बताई।
दो दिवसीय सम्मेलन को पांच प्रमुख सत्रों में विभाजित किया गया है, जिनमें कुल 14 एजेंडा शामिल हैं। इनमें छात्र-केंद्रित सुधार, उच्च शिक्षा, संकाय विकास, संस्थागत मजबूती, गुणवत्ता सुधार, अकादमिक सुधार, अनुसंधान, नवाचार और संस्थागत उत्कृष्टता जैसे विषय प्रमुख हैं।
सम्मेलन में प्रवेश प्रणाली, अनुसंधान फेलोशिप, सीट आवंटन, आईसीएआर-ऑल इंडिया कोटा परामर्श एवं सत्यापन, पशु चिकित्सा विज्ञान के लिए अलग पीएचडी काउंसलिंग तथा कृषि योग्य और हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए स्नातक स्तर की पात्रता जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।
इसके अलावा जेआरएफ और एसआरएफ अनुसंधान को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जोड़ने, गुणवत्ता आश्वासन और मान्यता व्यवस्था मजबूत करने, वित्तीय प्रबंधन तथा प्रदर्शन आधारित वित्त पोषण में सुधार पर भी विचार किया गया। उद्योग-अकादमिक संबंधों को मजबूत करने के लिए अप्रेंटिसशिप, इंटर्नशिप, पाठ्यक्रम संशोधन तथा दोहरी, ट्विनिंग और संयुक्त डिग्री कार्यक्रमों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।
संकाय विकास के तहत कृषि एवं संबद्ध विज्ञान की डिग्रियों की समानता, प्रशिक्षण आवश्यकताओं, विशेषज्ञता की पहचान और विशेषज्ञों के मानचित्रण पर चर्चा हुई। कृषि विश्वविद्यालयों में ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ के माध्यम से व्यावहारिक एवं पेशेवर विशेषज्ञता को अकादमिक क्षेत्र से जोड़ने के प्रस्ताव पर भी विचार किया गया। सम्मेलन में कृषि शिक्षा के लिए व्यापक डेटा इकोसिस्टम विकसित करने, ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (आरएडब्ल्यूई) को मजबूत करने और विद्यार्थियों को ग्रामीण वास्तविकताओं से जोड़ने पर भी बल दिया गया। साथ ही कृषि एवं कृषि खेल 2026 में कृषि विश्वविद्यालयों की भागीदारी बढ़ाने पर चर्चा हुई।
अनुसंधान एवं नवाचार के क्षेत्र में राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के बीच टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल (टीआरएल) बढ़ाने, अनुसंधान को व्यावहारिक तकनीकों और नवाचारों में बदलने की गति तेज करने तथा यूजीसी पीएचडी विनियम-2016 के समान क्रियान्वयन पर विचार किया गया। कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के लिए एनआईआरएफ रैंकिंग मानदंड और विशेषज्ञों की भागीदारी बढ़ाने के उपाय भी एजेंडे में शामिल रहे।
सम्मेलन में सामूहिक रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि कृषि विश्वविद्यालयों को शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार, उद्योग और ग्रामीण क्षेत्र के बीच मजबूत संबंध स्थापित करते हुए तकनीक-सक्षम और परिणाम आधारित संस्थानों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इससे कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, प्रतिस्पर्धी और किसानों के लिए लाभकारी बनाने में मदद मिलेगी।
इससे पहले आईसीएआर के उप महानिदेशक (कृषि शिक्षा) डॉ. यशपाल मलिक ने स्वागत भाषण दिया और सम्मेलन की पृष्ठभूमि रखी। उद्घाटन सत्र में पिछले कुलपतियों के सम्मेलन की कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने के साथ पूर्व में लिए गए निर्णयों की प्रगति की भी समीक्षा की गई।
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