गंगटोक : सिक्किम सरकार ने राज्य की प्रमुख नकदी फसल बड़ी इलायची के उत्पादन को पुनर्जीवित करने के लिए महत्वाकांक्षी अभियान ‘मेरो अलैंची, मेरो धन’ को तेज कर दिया है। मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में संचालित इस अभियान का उद्देश्य बड़ी इलायची की खेती को दोबारा मजबूत करना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देना और हजारों किसान परिवारों की आय में वृद्धि करना है।
गौरतलब है कि पिछले दो दशकों में जलवायु परिवर्तन, नई फंगस जनित बीमारियों और वायरल रोगों के लगातार प्रकोप के कारण सिक्किम में बड़ी इलायची का उत्पादन काफी घटा है। पहले बड़ी इलायची के पौधे 20 से 25 वर्षों तक उत्पादन देते थे, लेकिन अब कई स्थानों पर उनकी उत्पादक आयु घटकर केवल तीन से पांच वर्ष रह गई है। इससे किसानों की आय और राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सिक्किम सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने जैव प्रौद्योगिकी, रोग नियंत्रण, सहभागी पौध प्रजनन, जलवायु अनुकूल तकनीक और किसानों के खेतों में वैज्ञानिक प्रयोगों को जोड़ते हुए व्यापक मिशन शुरू किया है। इस कार्यक्रम के तहत पहली बार पार्टिसिपेटरी प्लांट ब्रीडिंग प्रणाली अपनाई गई है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक आनुवंशिक पुनर्संयोजन के माध्यम से बड़ी इलायची की आनुवंशिक विविधता को दोबारा विकसित करना है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि कई पीढि़यों से एक ही प्रकार की पौध सामग्री का वानस्पतिक तरीके से लगातार प्रसार किए जाने के कारण फसल का आनुवंशिक आधार संकुचित हो गया है। इसी वजह से पौधे बीमारियों और जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं। प्राकृतिक परागण और नई प्रजातियों के विकास के लिए राज्य के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में 12 फील्ड प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं। इनमें 10 प्रयोगशालाएं किसानों के खेतों में और दो संस्थागत परिसरों में बनाई गई हैं।
किसान फील्ड प्रयोगशालाएं तारखरका, पास्टिंग, दलपचंद, रोराथांग, बासिलाखा, असम लिंगजे, रुमटेक, रांका, मंगशिला और जंगू में स्थापित की गई हैं। दो संस्थागत प्रयोगशालाएं साजोंग स्थित राज्य जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान एवं अनुप्रयोग केंद्र तथा नाजीताम उद्यानिकी फार्म में बनाई गई हैं। इन केंद्रों में बड़ी इलायची की आठ अलग-अलग किस्मों-वरलांगे, सेरेमना, सावने, जंगू गोलसे, ग्रीन गोलसे, पाखे, हारियो और रामसे-का इस्तेमाल प्राकृतिक क्रॉस-पॉलिनेशन के लिए किया जा रहा है।
वर्ष 2025 में केंद्र सरकार के सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के आर्थिक सहयोग से शुरू किए गए कार्यक्रम में प्राकृतिक परागण से संभावित संकर बीज तैयार किए गए हैं। इनमें से कई बीज सफलतापूर्वक अंकुरित भी हो चुके हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस वर्ष एक साथ अधिक किस्मों में फूल आने से बड़ी संख्या में संकर बीज तैयार होंगे। इनसे अधिक उत्पादन, रोग प्रतिरोधक क्षमता और जलवायु परिवर्तन को सहन करने वाली नई किस्में विकसित की जा सकती हैं।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने बड़ी इलायची में रोग प्रबंधन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। विभाग ने जैविक खेती में अनुमत फफूंदनाशक का सही समय और सही क्षेत्र में इस्तेमाल कर नई तकनीक विकसित की है। फील्ड परीक्षणों में उपचार किए गए पौधों में बिना उपचार वाले पौधों की तुलना में नई कोंपलों की संख्या तीन से चार गुना अधिक पाई गई है।
वैज्ञानिकों के अनुसार फंगस जनित रोगों के कारण पौधों में नई कोंपलों का विकास रुक जाता है। इसके परिणामस्वरूप पौधे तीन से पांच वर्षों में ही कमजोर होकर समाप्त हो जाते हैं। नई तकनीक से स्वस्थ कोंपलों का विकास बढ़ेगा और पौधों की उत्पादक आयु लंबी होने की संभावना है। विभाग ने इस तकनीक पर आधारित एक विस्तृत पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज भी तैयार किया है। इसे मुख्यमंत्री ने हाल ही में सम्मान भवन में आयोजित परियोजना समीक्षा बैठक के दौरान जारी किया था। फिलहाल बड़ी इलायची उत्पादक क्षेत्रों में किसानों के लिए जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
वहीं, विभाग ने प्राकृतिक रूप से विकसित बड़ी इलायची की दो किस्मों-हारियो और पाखे-की पहचान की है। इन दोनों किस्मों में प्रमुख फंगस जनित रोगों और कुछ वायरल संक्रमणों के प्रति बेहतर सहनशीलता देखी गई है। लंबी अवधि के अनुसंधान और नई किस्मों के विकास के लिए साजोंग स्थित पांच एकड़ के राज्य जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान एवं अनुप्रयोग केंद्र में बड़ी इलायची की 14 से अधिक किस्मों का जर्मप्लाज्म संग्रह तैयार किया गया है। इसके अलावा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और ग्रामीण विकास विभाग ने बड़ी इलायची उत्पादक क्षेत्रों के 21 हजार परिवारों को शामिल करते हुए व्यापक आधारभूत सर्वेक्षण किया है। सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर भविष्य की नीतियां और सहायता योजनाएं तैयार की जाएंगी।
बड़ी इलायची के पुनरुद्धार अभियान को मजबूत करने के लिए सिक्किम सरकार ने देश के कई प्रतिष्ठित अनुसंधान संस्थानों के साथ सहयोग किया है। इनमें इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट जीनोम रिसर्च, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज, इंस्टीट्यूट ऑफ बायोरिसोर्सेज एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट और नेशनल एग्री-फूड बायोटेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट शामिल हैं।
इन संस्थानों के वैज्ञानिक सिक्किम के विशेषज्ञों के साथ मिलकर रोग नियंत्रण, जीनोम आधारित पौध प्रजनन, स्पीड ब्रीडिंग, आणविक जांच और रोग प्रतिरोधी पौध सामग्री विकसित करने पर काम कर रहे हैं। अभियान की वैज्ञानिक और तकनीकी जिम्मेदारी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग तथा सिक्किम राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक अधिकारी डॉ केबी सुब्बा और सहायक वैज्ञानिक अधिकारी डॉ सुशेन प्रधान संभाल रहे हैं। सरकार का मानना है कि वैज्ञानिक तकनीक, किसानों की भागीदारी और जलवायु अनुकूल खेती को एक साथ जोड़कर बड़ी इलायची की खेती को फिर से मजबूत किया जा सकता है। इससे राज्य में उत्पादन बढऩे के साथ किसानों की आय और ग्रामीण आजीविका में भी दीर्घकालीन सुधार होगा।
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