चरखे से आत्मनिर्भरता तक, सिक्किम में गांधी की विचारधारा के वाहक थे ‘गांधी पोखरेल’

गंगटोक : भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख केंद्रों से दूर हिमालयी राज्य सिक्किम में भी महात्मा गांधी के विचारों की गूंज पहुंची थी। इन्हीं विचारों से प्रभावित होकर त्रिलोचन पोखरेल, जिन्हें गांधी पोखरेल या बंदे पोखरेल के नाम से जाना जाता है, ने चरखे, खादी, सादगी और आत्मनिर्भरता को अपने जीवन का हिस्सा बनाया और इन मूल्यों को समाज तक पहुंचाने का प्रयास किया।

पूर्वी सिक्किम के तारेथांग में भद्रलाल और जानुका पोखरेल के घर जन्मे त्रिलोचन पोखरेल स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में गांधी के विचारों से प्रभावित हुए। सत्य, अहिंसा और सादगीपूर्ण जीवन उनके जीवन के प्रमुख आधार बने। उन्हें सिक्किम के शुरुआती प्रमुख स्वतंत्रता आंदोलन कार्यकर्ताओं में माना जाता है।

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने गुजरात के साबरमती आश्रम और बिहार के सर्वोदय आश्रम में समय बिताया। वहां उन्होंने चरखा चलाने के साथ आश्रम की गतिविधियों में हिस्सा लिया और सादगीपूर्ण जीवन को अपनाया। खादी के कपड़े, लकड़ी की चप्पल और हमेशा अपने साथ चरखा रखने की उनकी पहचान इतनी विशिष्ट बन गई कि उनके गांव के लोग उन्हें गांधी पोखरेल कहने लगे।

चरखा उनके लिए केवल स्वावलंबन का प्रतीक नहीं था, बल्कि लोगों से जुड़ने का माध्यम भी था। वे इसे लेकर रोंगली, रेनॉक, पाकिम और रंगपो के बाजारों में जाते और लोगों को चरखा चलाने का प्रदर्शन करते थे। स्थानीय उत्पादों और कौशल को प्रोत्साहित करने के उनके प्रयासों ने स्थानीय आजीविका, श्रम की गरिमा और सामुदायिक आत्मविश्वास को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई।

उस समय सिक्किम ब्रिटिश भारत के प्रत्यक्ष राजनीतिक ढांचे से बाहर था। इसके बावजूद गांधी के विचार हिमालयी राज्य तक पहुंचे और त्रिलोचन पोखरेल के जीवन में उनका व्यावहारिक रूप दिखाई दिया। उनका जीवन सादगी, अहिंसा, सेवा और सामुदायिक कल्याण के मूल्यों से जुड़ा रहा।

इन मूल्यों की प्रासंगिकता आज के सिक्किम में भी देखी जा सकती है। स्थानीय उद्यम और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना आत्मनिर्भरता की भावना से जुड़ता है। सामुदायिक भागीदारी और स्वैच्छिक सेवा सामाजिक कल्याण को मजबूत करती है। विभिन्न समुदायों के बीच सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा पहाड़ों, जंगलों और साझा प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी भी इन्हीं व्यापक मूल्यों को आगे बढ़ाती है।

त्रिलोचन पोखरेल के योगदान को समय के साथ औपचारिक पहचान भी मिली। सिक्किम सरकार ने उन्हें मरणोपरांत वर्ष 2018 में एलडी काजी पुरस्कार फॉर डेमोक्रेटिक मूवमेंट से सम्मानित किया। वर्ष 2026 में सिक्किम विधानसभा ने पाकिम एयरपोर्ट का नाम बदलकर त्रिलोचन पोखरेल एयरपोर्ट करने की सिफारिश संबंधी प्रस्ताव पारित किया। मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग ने भी 27 फरवरी 2026 को रंगपो में अखिल सिक्किम खास छेत्री-बाहुन कल्याण संघ के 31वें स्थापना दिवस समारोह में इस प्रस्ताव की घोषणा की थी।

इस प्रस्ताव के जरिए भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में त्रिलोचन पोखरेल के योगदान को सम्मान देने और राज्य की एक महत्वपूर्ण संस्था के माध्यम से उनकी विरासत को याद करने का प्रयास किया गया है। बंदे पोखरेल की पहचान केवल उन्हें मिले सम्मानों तक सीमित नहीं है। उनकी वास्तविक विरासत उन मूल्यों में दिखाई देती है जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में अपनाया और समाज के बीच पहुंचाया। एक छोटे हिमालयी राज्य में चरखे और सादगीपूर्ण जीवन से शुरू हुई उनकी कहानी आज भी सिक्किम के सामाजिक जीवन में आत्मनिर्भरता, सेवा और सामुदायिक जिम्मेदारी के रूप में प्रासंगिक बनी हुई है।

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