एससी-एसटी समुदायों को न्याय दिलाने के लिए कानूनी ढांचे को मजबूती

रामदास अठावले

एक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज की नींव इस भरोसे पर टिकी होती है कि प्रत्येक नागरिक गरिमा, समानता और सुरक्षा के साथ जीवन यापन कर सके। अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए यह प्रतिबद्धता मजबूत संवैधानिक सुरक्षा उपायों, प्रभावी कानूनों और उत्तरदायी संस्थाओं के माध्यम से ठोस रूप लेती है। इसलिए, भारत सरकार ने अत्याचारों की रोकथाम, पीड़ितों की सुरक्षा और समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए कानूनी और संस्थागत फ्रेमवर्क को लगातार मजबूत किया है।

इस फ्रेमवर्क का आधार दो प्रमुख कानून हैं: नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (पीसीआर एक्ट) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (एससी/एसटी (पीओए) एक्ट)। वर्षों से इन कानूनों को विधायी संशोधनों, बेहतर राहत और पुनर्वास प्रावधानों, विशेष न्यायिक तंत्रों, शिकायत-निवारण प्रणालियों तथा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता के जरिए सुदृढ़ किया गया है।न्याय के लिए एक अधिक सशक्त कानूनी फ्रेमवर्क

जाति-आधारित अत्याचारों के प्रति संवेदनशील समुदायों की चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से समाधान करने के लिए एससी/एसटी (पीओए) अधिनियम, 1989 में उल्लेखनीय विकास हुआ है। इस दिशा में एक बड़ा कदम 26 जनवरी 2016 से प्रभावी हुए संशोधनों के जरिए उठाया गया।

इन संशोधनों में अपराधों की त्वरित सुनवाई के लिए अनन्य विशेष न्यायालयों की स्थापना और अनन्य विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया। अधिनियम में कई नए प्रकार के अत्याचारों को भी शामिल किया गया, जिससे एससी और एसटी समुदायों को उपलब्ध कानूनी सुरक्षा का दायरा व्यापक हुआ।

उतना ही महत्वपूर्ण पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों से जुड़ा एक समर्पित अध्याय जोड़ना भी था। पीड़ितों, उनके आश्रितों और गवाहों के प्रति राज्य सरकारों की जिम्मेदारियों को और सुदृढ़ किया गया-यह स्वीकार करते हुए कि न्याय केवल मामले के पंजीकरण और मुकदमे की सुनवाई तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें प्रभावित लोगों की सुरक्षा, गरिमा और पुनर्वास भी शामिल होना चाहिए।

इसके बाद, 14 अप्रैल 2016 को एससी/एसटी (पीओए) नियम, 1995 में संशोधन किए गए। इन संशोधनों ने राहत और पुनर्वास फ्रेमवर्क को मजबूत किया, अत्याचार के 47 अपराधों के लिए निर्धारित राहत राशि में वृद्धि की और पीड़ितों तथा उनके आश्रितों को समय पर वित्तीय सहायता के वितरण पर जोर दिया।

20 अगस्त 2018 को एससी/एसटी (पीओए) अधिनियम में किए गए संशोधन के माध्यम से और भी महत्वपूर्ण बदलाव पेश किए गए। इस संशोधन ने इस कानून के तहत मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। इसके अलावा, अधिनियम के तहत अपराध के आरोपी व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता को भी हटा दिया गया।

उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था: प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं एससी और एसटी के खिलाफ अत्याचार से जुड़े अपराधों के पंजीकरण, जांच और अभियोजन में बाधा नहीं बननी चाहिए।

एससी/एसटी (पीओए) नियम, 1995 में 27 जून 2018 को भी संशोधन किया गया, जिसने मृत्यु, चोट, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, एसिड हमले, संपत्ति के नुकसान और कानून के दायरे में आने वाले अन्य अपराधों के मामलों में राहत प्रावधानों को और मजबूत किया।

ये सुधार इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करते हैं कि कानून को केवल कागजों पर ही मजबूत नहीं होना चाहिए, बल्कि जब कोई पीड़ित सुरक्षा और न्याय की गुहार लगाए, तब उसे सुलभ और संवेदनशील भी होना चाहिए।

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराधों की सुनवाई के लिए 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 217 अनन्य विशेष न्यायालय स्थापित किए जा चुके हैं। यह अधिनियम संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से, उन जिलों में सत्र न्यायालयों को विशेष न्यायालय के रूप में नामित करने का भी प्रावधान करता है जहां मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम है।

अनन्य विशेष न्यायालयों की स्थापना और सुदृढ़ीकरण का उद्देश्य अधिनियम के तहत मामलों की त्वरित सुनवाई और प्रभावी निस्तारण को सुगम बनाना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि पीड़ितों की पहुंच विशेष न्यायिक तंत्र तक हो।

कानूनी सुरक्षा तभी सार्थक होती है जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों और उचित सहायता प्राप्त कर सकें। इसे ध्यान में रखते हुए, 13 दिसंबर 2021 को एससी और एसटी पर अत्याचार के खिलाफ राष्ट्रीय हेल्पलाइन (एएचएए) शुरू की गई, जिसे बाद में ‘संबल’ नाम दिया गया।

टोल-फ्री नंबर 1800-202-1989 और शॉर्ट कोड हेल्पलाइन 14566 को एससी/एसटी (पीओए) अधिनियम के प्रावधानों के बारे में अधिक जागरूकता फैलाने और सूचना, मार्गदर्शन तथा शिकायत निवारण तंत्र तक पहुंच को आसान बनाने के लिए तैयार किया गया है। यह अत्याचार से प्रभावित व्यक्तियों को अपने कानूनी अधिकारों और उपलब्ध उपायों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम प्रदान करता है।

जागरूकता और सुलभता को बढ़ाकर, यह हेल्पलाइन सुरक्षा और न्याय के व्यापक संस्थागत फ्रेमवर्क को मजबूती प्रदान करती है।

किसी भी कानून की प्रभावशीलता अंततः उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। इसलिए, सरकार ने हितधारकों तथा संबंधित मंत्रालयों और विभागों के साथ परामर्श के बाद पीसीआर अधिनियम, 1955 और एससी/एसटी (पीओए) अधिनियम, 1989 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुविधाजनक बनाने के लिए योजना दिशानिर्देश जारी किए हैं।

ये दिशानिर्देश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सहायता प्रदान करने तथा रोकथाम, सुरक्षा, राहत, पुनर्वास और जागरूकता से संबंधित उपायों को मजबूत करने के लिए एक संरचित रूपरेखा तैयार करते हैं।

सरकार ने कार्यान्वयन के दौरान सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों का भी समाधान किया है। उदाहरण के लिए, एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से दूसरे में स्थानांतरित होने वाले पीड़ितों या आश्रितों को राहत प्रदान करने के लिए जिम्मेदार प्राधिकारी के संबंध में प्रश्न उठे थे।

स्पष्टता और एकरूपता लाने के लिए, 20 जून 2025 को जारी एक स्पष्टीकरण में यह निर्धारित किया गया कि एससी/एसटी (पीओए) नियमों के तहत निर्धारित राहत राशि उस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश द्वारा प्रदान की जाएगी जहां अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।

ऐसे उपाय महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कानून के तहत उपलब्ध सुरक्षा तब भी प्रभावी रहनी चाहिए जब पीड़ित या उनके आश्रित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सीमाओं से बाहर चले जाएं। यह स्पष्टीकरण राहत राशि के समय पर वितरण की सुविधा प्रदान करता है और कार्यान्वयन में निरंतरता को मजबूत करता है।

पीसीआर अधिनियम, 1955 और एससी/एसटी (पीओए) अधिनियम, 1989 के कार्यान्वयन के लिए केंद्र प्रायोजित योजना प्रवर्तन तंत्र को मजबूत करने, पीड़ितों को राहत और पुनर्वास प्रदान करने तथा सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

वर्ष 2014-15 से अब तक इस योजना के तहत 5,012.17 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की जा चुकी है। इस अवधि के दौरान, अत्याचार के लगभग 7,26,588 पीड़ितों को राहत प्रदान की गई है, जबकि 2,21,716 जोड़ों को अंतरजातीय विवाह के लिए प्रोत्साहन राशि प्राप्त हुई है।

ये आंकड़े केवल वित्तीय आवंटन और लाभार्थियों की संख्या से कहीं अधिक हैं। ये सरकार के उस निरंतर प्रयास को दर्शाते हैं जो यह सुनिश्चित करता है कि पीड़ितों को आवश्यकता पड़ने पर सहायता मिले और समानता तथा समावेशन को बढ़ावा देने वाले उपायों के माध्यम से सामाजिक सद्भाव को बल मिले।

एससी/एसटी (पीओए) अधिनियम और नियमों को सुदृढ़ करना, विशेष न्यायिक तंत्र की स्थापना, राहत और पुनर्वास प्रावधानों में वृद्धि, एक राष्ट्रीय हेल्पलाइन का गठन, कार्यान्वयन दिशानिर्देश जारी करना और निरंतर केंद्रीय वित्तीय सहायता-ये सभी मिलकर एससी और एसटी समुदायों की सुरक्षा की दिशा में एक व्यापक दृष्टिकोण तैयार करते हैं।

हमारी प्रतिबद्धता केवल अत्याचार होने के बाद प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं है। यह समान रूप से रोकथाम, जागरूकता, संस्थागत जवाबदेही, समय पर राहत, पुनर्वास और ऐसी परिस्थितियां बनाने के बारे में भी है जिसमें प्रत्येक नागरिक गरिमा के साथ और बिना किसी डर के जी सके।

भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता, गरिमा और न्याय की गारंटी देता है। इन मूल्यों की रक्षा के लिए निरंतर सतर्कता, प्रभावी कार्यान्वयन और केंद्र, राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के बीच घनिष्ठ सहयोग की आवश्यकता है।

सरकार इन तंत्रों को मजबूत करने, कार्यान्वयन की चुनौतियों का समाधान करने और यह सुनिश्चित करने की दिशा में काम करना जारी रखेगी कि कानूनी सुरक्षा उपाय ज़मीनी स्तर पर सार्थक सुरक्षा में परिवर्तित हों। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए न्याय केवल एक संवैधानिक वादा नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे गरिमा, सुरक्षा, समानता और अवसर की एक जीवंत वास्तविकता के रूप में अनुभव किया जाना चाहिए।

(लेखक सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री हैं)

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