प्रकाश अधिकारी
भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) द्वारा मतदाता सूचियों का विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों में जनता के विश्वास का एक विवादास्पद परीक्षण बन गया है। समर्थक इसे मृत, डुप्लीकेट, स्थानांतरित और अन्य अयोग्य मतदाताओं की पहचान करने के लिए एक आवश्यक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। आलोचकों को डर है कि मतदाता सूचियों को साफ करने के उद्देश्य से की गई इस प्रक्रिया से वैध नागरिक, विशेष रूप से प्रवासी मजदूर, गरीब परिवार और दस्तावेजीकरण की आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ लोग बाहर हो सकते हैं। दोनों दृष्टिकोण सावधानीपूर्वक जांच के पात्र हैं।
SIR कोई नया तंत्र नहीं है। चुनाव आयोग ऐतिहासिक रूप से सघन पुनरीक्षण करता रहा है, जबकि चुनावों के बीच मतदाता सूचियों को अपडेट करने की सामान्य प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। संविधान के अनुच्छेद 324 और 326, और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत, आयोग चुनाबों का प्रबंधन करता है, जबकि मतदाता के रूप में पंजीकरण करने की पात्रता भारतीय नागरिकता, आयु और सामान्य निवास जैसी कानूनी शर्तों पर निर्भर करती है। हालांकि, चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वायतता इसके निर्णयों को न्यायिक समीक्षा या इसकी प्रक्रियाओं को सार्वजनिक जांच से छूट नहीं देती है।
आंकड़े बर्तमान बिबाद को स्पष्ट करते हैं। दिल्ली में, 31 अगस्त, 2026 को प्रकाशित प्रारंभिक सूची में लगभग 97.53 लाख मतदाता थे, जबकि पुनरीक्षण से पहले मतदाताओं की संख्या 1.45 करोड़ थी। प्रारंभिक सूची से लगभग 47.56 लाख नाम गायब थे, जो लगभग 33 प्रतिशत की गिरावट है। चुनाव आयोग की गणना प्रक्रिया ने इन गायब फॉर्मों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लीकेट और अन्य मामलों जैसी श्रेणियों में वर्गीकृत किया। ये ड्राफ्ट रोल से अस्थायी निष्कासन हैं, न कि इस बात का पक्का प्रमाण कि हर प्रभावित व्यक्ति एक अवैध मतदाता था। इसके अलावा, केवल गणना फॉर्म का न होना, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि कोई व्यक्ति अयोग्य है।
अवैध अप्रवासन और चुनावी धोखाधड़ी के बारे में दावों का विश्लेषण करते समय यह अंतर महत्वपूर्ण है। एक इप्लीकेट प्रविष्टि, एक मृत मतदाता, स्थानांतरित हो चुका व्यक्ति, और एक गैर-नागरिक अलग-अलग श्रेणियां हैं जिनके लिए अलग-अलग प्रमाण की आवश्यकता होती है। 9 अक्टूबर, 2026 तक, यहां उद्धृत आंकड़े एसआईआर के माध्यम से निश्चित रूप से पहचाने गए अवैध अप्रवासियों की कोई सत्यापित राष्ट्रव्यापी गिनती स्थापित नहीं करते हैं। इसलिए, प्रारंभिक सूचियों से गायब नामों की कुल संख्या को फर्जी या विदेशी मतदाताओं की संख्या मान लेना भ्रामक होगा। इसी तरह, यह मान लेना कि हटाया गया हर नाम एक वैध नागरिक का ही है, उपलब्ध साक्ष्यों से परे जाना होगा।
आयोग ने इन चिंताओं को दूर करने के लिए उपाय पेश किए हैं, जिनमें इसके मतदाता पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन सेवाएं, दावे और आपत्तियां दर्ज करने की प्रक्रियाएं, निर्वाचक निबंधन अधिकारियों दवारा सत्यापन और अतिरिक्त नामांकन अभियान शामिल हैं। दिल्ली में, अक्टूबर की शुरुआत तक 10.28 लाख से अधिक नोटिसों का निपटारा किया जा चुका था, जबकि प्रारंभिक सूची से छूट गए लोगों के लिए विशेष शिविर और अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था की जा रही थी। ये कदम दर्शाते हैं कि सुधार तंत्र मौजूद हैं, हालांकि उनकी प्रभावशीलता का अंदाजा इस बात से लगाया जाना चाहिए कि वैध मतदाता कितनी आसानी से अपने नाम को बहाल कर पाते हैं।
फिर भी, गंभीर सवाल बाकी हैं। 5 अक्टूबर को, सुप्रीम कोर्ट ने पुनरीक्षण की चुनौतियों पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। अगले दिन, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म 6 के संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी थी और ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव के प्राधिकरण से संबंधित रिकॉर्ड मांगे। चुनाव आयोग का कहना है कि वैधानिक फॉर्म में कोई संशोधन नहीं किया गया था और विवादित घोषणा एसआईआर से संबंधित एक अलग आवश्यकता थी। इस मुद्दे पर अब परस्पर विरोधी राजनीतिक दावों के बजाय दस्तावेजी स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।
व्यावहारिक चिंताएं भी हैं। बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) के दौरे के समय प्रवासी श्रमिक बाहर हो सकते हैं; बेघर लोगों और झुग्गी-झोपड़ियों के निवासियों का पता लगाना मुश्किल हो सकता है; और नाम, उम या पारिवारिक रिकॉर्ड में विसंगतियां नोटिस जारी होने का कारण बन सकती हैं। अपील का विकल्प उपलब्ध होने मात्र से गलत तरीके से बाहर किए जाने का जोखिम खत्म नहीं होता। समाधान तभी सार्थक है जब नागरिकों को स्पष्ट नोटिस मिले, वे समझें कि कौन सा प्रमाण आवश्यक है, और बिना अत्यधिक खर्च या देरी के किसी अधिकारी तक पहुंच सकें। इसलिए, विपक्षी दल पारदर्शी मानदंड, स्वतंत्र रूप से ऑडिट करने योग्य आकड़े और मनमाने ढंग से नाम हटाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपायों की मांग करने में उचित हैं। हालांकि, जानबूझकर किए गए राजनीतिक हेरफेर के आरोपों को केवल कुल आंकड़ों से अनुमान लगाने के बजाय तर्थ्यो द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए।
पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे और केरल उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश पी. एन. रवींद्रन ने तर्क दिया है कि निराधार आरोपों के माध्यम से संबैधानिक संस्थानों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए और पीड़ित मतदाताओं को स्थापित कानूनी उपचारों का उपयोग करना चाहिए। उनके तर्क एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को सुदृढ़ करते हैं: संस्थागत आलोचना साक्ष्य-आधारित होनी चाहिए। लेकिन कानूनी उपचार का सहारा लेना और सार्वजनिक जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। चुनाव आयोग को जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए अपने निर्णयों को पर्याप्त स्पष्टता के साथ समझाना चाहिए।
एसआईआर की परीक्षा केबल यह नहीं है कि कितने नाम हटाए गए हैं। बल्कि यह है कि क्या हर निष्कासन कानूनी आधारों द्वारा समर्थित है, क्या योग्य मतदाता प्रभावी ढंग से त्रुटियों को चुनौती दे सकते हैं, और क्या अंतिम सूचियां प्रामाणिक रूप से अधिक सटीक हैं। चुनावी अखंडता के लिए अयोग्य मतदान को रोकना और प्रत्येक योग्य नागरिक के मताधिकार की रक्षा करना, दोनों आवश्यक हैं। किसी भी एक उद्देश्य की कीमत पर दूसरे से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
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