ज्वेलरी उद्योग की चिंता पूरी तरह जायज़ : चिराग पासवान

ज्वेलरी उद्योग केवल व्यापार नहीं, करोड़ों परिवारों की आजीविका: एआईजेजीएफ

पटना । ऑल इंडिया ज्वेलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन (एआईजेजीएफ) के प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान से मुलाकात कर ज्वेलरी उद्योग से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। बैठक के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने देश के ज्वेलरी उद्योग की मौजूदा स्थिति, गोल्ड इंपोर्ट को लेकर बढ़ती चिंताओं और उद्योग से जुड़े करोड़ों लोगों की आजीविका के सवाल को विस्तार से मंत्री के सामने रखा।

फेडरेशन ने कहा, ज्वेलरी उद्योग केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की परंपरा, संस्कृति और रोजगार से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

एआईजेजीएफ प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय मंत्री को बताया कि हाल के दिनों में सोना खरीदने को टालने जैसी अपीलों से बाजार में नकारात्मक संदेश जा रहा है। इसका सीधा असर ज्वेलरी कारोबार और इससे जुड़े छोटे व्यापारियों और कारीगरों पर पड़ सकता है। प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि देशभर में लाखों छोटे ज्वेलर्स, सुनार, कारीगर, आर्टिजन, मैन्युफैक्चरर्स, रिफाइनर्स, हॉलमार्किंग सेंटर और ट्रांसपोर्टर्स इस उद्योग पर निर्भर हैं। यदि सोने की मांग कम होती है तो सबसे ज्यादा नुकसान छोटे कारोबारियों और मजदूर वर्ग को होगा।

फेडरेशन के अनुसार भारत में करीब 3.5 करोड़ लोगों की आजीविका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ज्वेलरी उद्योग से जुड़ी हुई है। इसलिए किसी भी नीति या अपील का असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रोजगार और घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि देश का गोल्ड इंपोर्ट बिल कम करना निश्चित रूप से जरूरी है, क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है। लेकिन इसका समाधान ज्वेलरी की मांग को कम करने में नहीं है।

एआईजेजीएफ ने सुझाव दिया कि देश में पहले से मौजूद निष्क्रिय सोने को आर्थिक गतिविधियों में शामिल करने की दिशा में काम होना चाहिए। फेडरेशन ने बताया कि भारतीय घरों, मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं और गोल्ड ईटीएफ में भारी मात्रा में सोना पड़ा हुआ है, जिसका सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। फेडरेशन का कहना है कि यदि इस सोने को व्यवस्थित तरीके से बाजार और उद्योग तक पहुंचाया जाए, तो देश की आयात पर निर्भरता काफी कम हो सकती है।

एआईजेजीएफ ने केंद्र सरकार के सामने ‘बुलियन बैंक फ्रेमवर्क’ लागू करने का प्रस्ताव रखा। फेडरेशन के मुताबिक यह व्यवस्था देश के गोल्ड इकोसिस्टम को आधुनिक और संगठित बनाने में मदद करेगी।

प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि इस मॉडल के तहत घरों, मंदिरों और संस्थाओं में पड़े सोने को बैंकिंग व्यवस्था के जरिए मोब्लाइज किया जा सकता है। इसके बाद इस सोने को ज्वेलरी उद्योग, मैन्युफैक्चर्स, एक्सपोर्टर्स और रिफाइनर्स तक व्यवस्थित रूप से उपलब्ध कराया जा सकेगा।

फेडरेशन का दावा है कि इससे गोल्ड इंपोर्ट में कमी आएगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और घरेलू ज्वेलरी उद्योग को भी मजबूती मिलेगी। साथ ही यह व्यवस्था लंबे समय के लिए देश की अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

बैठक के दौरान केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से सुना। उन्होंने कहा कि ज्वेलरी उद्योग की चिंता पूरी तरह जायज़ है और सरकार इस विषय को गंभीरता से देखेगी। मंत्री ने प्रतिनिधिमंडल से कहा कि उन्हें 2-3 दिन का समय दिया जाए। प्रधानमंत्री के भारत लौटने के बाद वह उनसे मुलाकात कर ज्वेलरी उद्योग से जुड़े मुद्दों और संभावित समाधान पर चर्चा करेंगे। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि उद्योग की बात सरकार के उचित मंच तक पहुंचाई जाएगी और सकारात्मक समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा।

एआईजेजीएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंकज अरोड़ा ने कहा कि ज्वेलरी उद्योग केवल एक व्यापार नहीं, बल्कि देश की परंपरा और करोड़ों परिवारों की आजीविका का आधार है। भारत का ज्वेलरी सेक्टर रोजगार देने वाले सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक है। ऐसे में सरकार और उद्योग के बीच बेहतर संवाद की जरूरत है ताकि ऐसी नीतियां बनाई जा सकें जो उद्योग और देश दोनों के हित में हों।

लोजपा (रामविलास) के व्यवसायिक प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार वर्मा ने कहा कि भारत को विदेशी मुद्रा बचाने और ज्वेलरी उद्योग को सुरक्षित रखने में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है। फ्रेमवर्क जैसे व्यावहारिक कदमों के जरिए दोनों लक्ष्य एक साथ हासिल किए जा सकते हैं। इससे एक तरफ गोल्ड इम्पोर्ट बिल कम होगा और दूसरी तरफ घरेलू ज्वेलरी उद्योग को मजबूती मिलेगी।

उन्होंने कहा कि भारत को अपने ज्वेलरी इकोसिस्टम को कमजोर करने के बजाय उसे आधुनिक, पारदर्शी और उत्पादक बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

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