हादसा पीड़ितों को ‘सम्मान’ भी चाहिए, सिर्फ मुआवजा नहीं : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि सड़क हादसों में अपने अंग गंवाने वाले पीड़ित केवल गुजारे के नहीं, बल्कि सम्मान के हकदार हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि मोटर दुर्घटना पीड़ितों को उच्च गुणवत्ता वाले प्रोस्थेटिक लिम्ब यानी कृत्रिम अंग मिलना उनका अधिकार है। अदालत ने कहा कि ये अंग व्यक्ति को उसी जीवन के करीब ले जाते हैं, जो उसने विकलांगता से पहले जिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक कृत्रिम अंग केवल मेडिकल उपकरण नहीं है। यह एक कटे हुए अंग वाले व्यक्ति के आत्मविश्वास और सशक्तिकरण का जरिया है। शीर्ष अदालत ने कहा, ‘जो लोग अपनी भुजा या पैर नहीं खोते, वे शायद उस दर्द और जरूरत को नहीं समझ सकते। यह उपकरण व्यक्ति के लिए इतना निजी है कि इसकी अहमियत केवल वही समझ सकता है जो इसके सहारे अपनी जिंदगी दोबारा खड़ा करना चाहता है।’

यह फैसला प्रहलाद सहाय नामक ड्राइवर की अपील पर आया। साल 2007 में हरियाणा रोडवेज की बस ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी थी, जिसमें उन्होंने अपना दाहिना पैर गंवा दिया। निचली अदालत और राजस्थान हाई कोर्ट ने उन्हें करीब 13 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपर्याप्त मानते हुए बीमा कंपनी को 36.20 लाख रुपये अतिरिक्त भुगतान करने का आदेश दिया। अब उन्हें कुल 50 लाख रुपये के करीब मुआवजा मिलेगा।

बीमा कंपनी ने तर्क दिया था कि मुआवजा सरकारी दरों के अनुसार होना चाहिए। पीठ ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सरकारी दर बेहद कम है। शीर्ष अदालत ने कहा, अगर पीड़ित का इलाज उचित है, तो प्रतिवादी यह नहीं कह सकता कि सस्ता विकल्प चुनें। कोर्ट ने माना कि पीड़ितों को निजी केंद्रों से अपनी जरूरत के अनुसार उपकरण चुनने का पूरा अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने गणना के लिए नए मानक तय किए हैं। एक प्रोस्थेटिक लिम्ब यानी कृत्रिम अंग की उम्र केवल 5 साल मानी जाएगी। वहीं, पीड़ित की जीवन प्रत्याशा 70 वर्ष मानी जाएगी। सहाय के मामले में, 7 बार अंग बदलने के लिए 21 लाख और रखरखाव के लिए 5 लाख रुपये दिए गए। कोर्ट ने माना कि एक ड्राइवर के लिए पैर का कटना 100 फीसदी कार्यात्मक विकलांगता है।

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