संयुक्त राष्ट्र में ईरान-अमेरिका-इस्राइल टकराव की गूंज

तनवीर जाफ़री

अमेरिका, इस्राईल व ईरान के बीच चल रहे युद्ध के बीच बुलाये गये संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस 81वें अधिवेशन पर पूरे विश्व की नज़रें टिकी थीं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अरागची,संयुक्त राष्ट्र में ईरान के स्थायी मिशन के प्रतिनिधि और राष्ट्रपति व विदेश मंत्री के सहयोगी इस सत्र में शामिल हुये। महासभा को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्र के पहले ही दिन यानी 22 सितंबर को संबोधित किया जबकि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने दूसरे दिन अर्थात 23 सितंबर को महासभा में अपना भाषण दिया। सत्र के तीसरे दिन 24 सितंबर को इस्राईली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने संबोधित किया। लगातार तीन दिनों तक इन नेताओं के एक दूसरे पर वार पलटवार किये जाने के कारण महासभा में इन देशों के बीच गहरा कूटनीतिक तनाव देखने को मिला।

तनाव की शुरुआत 22 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण से ही हो गयी थी। जबकि ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि उन्हें ‘एक बड़ा फ़ैसला लेना है। या तो ईरान के साथ ऐसा समझौता किया जाए जिससे उसे फिर से निर्माण करने और बेहतर देश बनने का मौक़ा मिले, या फिर इस्लामिक रिपब्लिक व्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट कर दिया जाए’। उन्होंने अपने ही अंदाज़ में सवाल किया कि ‘क्या वे ईरान को बचने का मौक़ा दिए  बिना उसे ‘नरक (जहन्नुम)’ में धकेल दें’? ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा, और यह उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। ट्रंप ने ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का खुलकर बचाव किया। इतना ही नहीं बल्कि ट्रंप ने ईरान को ‘आतंकवाद का नंबर वन प्रायोजक’ क़रार दिया और आरोप लगाया कि पिछले 51 वर्षों से इस शासन ने मध्य पूर्व और दुनिया भर में अराजकता फैलाई है। ट्रंप ने दुनिया के अन्य देशों से भी यह अपील की कि वे तेहरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखें और ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने में अमेरिका का साथ दें।

इसके बाद 23 सितंबर को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख देने वाला एक बेहद भावनात्मक, सत्यपरक, आक्रामक और ऐतिहासिक भाषण दिया। ईरानी राष्ट्रपति के भाषण के दौरान ही अमेरिकी प्रतिनिधि वाकआउट कर गये जबकि इस्राईल ने पहले से ही बहिष्कार करने का फ़ैसला किया हुआ था। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने कहा कि हम आतंकवादी नहीं, बल्कि आतंक के पीड़ित हैं। उन्होंने मंच से पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई और ईरानी मिनाब स्कूल में मारे गए मासूम बच्चों की तस्वीरें दिखाईं। उन्होंने ट्रंप के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि जो खुद आतंकवादी हैं, वे हमें इस शब्द से संबोधित कर रहे हैं। मैं उस ईरान से आता हूँ जहाँ हमारे आदरणीय सर्वोच्च नेता की हत्या बिना किसी क़ानूनी ढांचे या कारण के अमेरिका-इस्राईल के संयुक्त हमले में कर दी गई थी। पेज़ेशकियन ने कहा कि हमने पिछले 200 सालों में किसी भी देश पर पहले हमला नहीं किया है। हमारे निर्दोष लोग कायरतापूर्ण हमलों का शिकार बने हैं, हमने केवल अपनी रक्षा की है। अमेरिकी धमकियों का जवाब देते हुए ईरानी राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन वह दबाव के आगे झुकेगा नहीं, हमने कभी घुटने नहीं टेके और न ही कभी अपना सिर झुकाएंगे। ईरान अपनी हिफ़ाज़त के लिए किसी दूसरे देश से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं समझता। हमने हमलों का जवाब दिया है, लेकिन हमने कभी नागरिक आबादी को निशाना नहीं बनाया। परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे पर पेज़ेशकियन ने पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंडों की कड़ी आलोचना करते हुये कहा कि ईरान परमाणु बम नहीं बनाना चाहता, लेकिन वह शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक का अपना अधिकार भी कभी नहीं छोड़ेगा। हमारे बीमार लोगों के इलाज के लिए, कृषि और उद्योगों की प्रगति के लिए यह ऊर्जा ज़रूरी है। दूसरी तरफ़ इज़रायल के पास परमाणु हथियार हैं, जो परमाणु अप्रसार संधि का हिस्सा भी नहीं है, फिर भी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां केवल ईरान पर पाबंदियां लगाती हैं। मसूद पेज़ेश्कियान ने यूनाइटेड नेशंस में साफ़ कहा कि फ़िलिस्तीन का मसला हल किए बिना हम शांति की बात नहीं कर सकते।

ईरानी राष्ट्रपति ने ग़ज़ा में जारी हिंसा को लेकर इस्राईल को घेरा और कहा कि इस्राईल वहां बेक़ुसूर नागरिकों की हत्या कर रहा है, लेकिन आर्थिक प्रतिबंध तेहरान पर थोपे जा रहे हैं। उन्होंने ग़ज़ा में मारे गए और विस्थापित हुए हज़ारों नागरिकों के प्रति अपना अटूट समर्थन व्यक्त किया। ईरान के भीतर हुए हालिया आंतरिक प्रदर्शनों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने इसे सरकार के विरोध के रूप में नहीं, बल्कि जनता द्वारा अपने देश और सुरक्षा के प्रति एकजुटता और समर्थन के रूप में पेश किया। पेज़ेशकियन ने कहा कि तनाव के बावजूद उन्होंने बातचीत के दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं किए हैं। उन्होंने कहा कि ईरान हमेशा से समझौते की मेज़ पर आने के लिए प्रतिबद्ध रहा है और कूटनीति और बातचीत के रास्ते खुले हैं। लेकिन बातचीत बिना किसी सैन्य या आर्थिक दबाव के बराबरी के स्तर पर होनी चाहिए। शायद यह पहला अवसर था जबकि अमेरिका की धरती पर ही किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष ने अमेरिका को ही आतंकवादी व हत्यारा होने जैसे आरोप लगाये।

परन्तु महासभा में 24 सितंबर को जब इस्राईली प्रधानमंत्री नेतन्याहू बोलने के लिये मंच पर आये और जैसे ही उन्होंने अपना भाषण शुरू किया उसी समय 77 देशों के प्रतिनिधिमंडल ने हॉल से वॉकआउट कर दिया। वाकआउट करने वाले देशों में अरब क्षेत्र के 18 देश, एशिया के 14, अफ्रीका के 20, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र के 17, यूरोप के 6 तथा प्रशांत के 2 देश शामिल थे। इस सामूहिक बहिष्कार से चिढ़े नेतन्याहू ने क़रीब 3 मिनट तक शांत रहने के बाद वॉकआउट करने वाले प्रतिनिधियों को सीधे तौर पर “नैतिक रूप से कायर” कहकर संबोधित किया। उन्होंने कहा, भाषण शुरू करने से पहले मैं एक छोटी सी घोषणा करना चाहता हूं। अगर इस हॉल में कोई और ‘नैतिक रूप से कायर’ बचा है जो अब तक बाहर नहीं गया है, तो कृपया वह भी अभी बाहर चला जाए। इसके बाद उन्होंने ग़ज़ा सहित ईरान पर की जाने वाली सभी इस्राईली सैन्य कार्रवाइयों को जायज़ ठहराया। उधर नेतन्याहू के भाषण के दौरान हज़ारों लोग संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर नेतन्याहू विरोधी रैली में उन्हें हत्यारा व मानवता विरोधी बता रहे थे। वहां दर्जनों प्रदर्शनकारियों को न्यूयॉर्क पुलिस ने गिरफ़्तार भी किया। बहरहाल ईरान की इसी शुचिता, सत्यवादिता, निर्भयता,नेकनीयती व यथार्थता ने आज जहाँ उसे विश्व के लोकप्रिय देशों की सूची में ला खड़ा किया है वहीं अमेरिका व इस्राईल जैसे देशों के प्रति दुनिया में लोगों का ग़ुस्सा व उनके प्रति नफ़रत बढ़ती जा रही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में ईरान ने अमेरिका व इस्राईल द्वारा फैलाये जा रहे वास्तविक वैश्विकआतंकवाद को और भी बेनक़ाब कर दिया है।

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