जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का मकसद बच्चे हैं, अपराधी नहीं : सीजेआई सूर्यकांत

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट की ओर से शनिवार को नेशनल कंसल्टेशन (राष्ट्रीय विचार-विमर्श) आयोजित किया। इसका मकसद पिछले एक दशक में ‘जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट, 2015’ के लागू होने का आकलन करना और आने वाले वर्षों में बच्चों की सुरक्षा और जुवेनाइल जस्टिस सिस्टम को मजबूत करने के लिए प्राथमिकताएं तय करना है।

इसके उद्घाटन समारोह में, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा, मैं जस्टिस नागरत्ना की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की जुवेनाइल जस्टिस कमेटी और यूनिसेफ को बधाई देता हूं कि उन्होंने जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट, 2015 के 10 साल पूरे होने के मौके पर हम सभी को एक साथ इकट्ठा किया। इस एक्ट का मकसद बच्चे हैं, अपराधी नहीं। 15 साल के बच्चे से इस एक्ट का पहला वादा इसके शब्दों में ही छिपा है। संसद ने 2015 में दोनों को ‘बच्चे’ कहना चुना और निर्देश दिया कि उनसे जुड़ी किसी भी प्रक्रिया में कोई भी विरोधी या आरोप लगाने वाले शब्दों का इस्तेमाल न किया जाए।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, 2015 का एक्ट यह मानता है कि अगर किसी बच्चे को दूसरा मौका दिया जाए, तो उसके अपराधी का ठप्पा लगने वाले बच्चे की तुलना में समाज का एक उपयोगी सदस्य बनने की संभावना कहीं ज्यादा होती है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उन्हें सजा से छूट मिल जाएगी, क्योंकि यह एक्ट गंभीर अपराधों के मामले में 16 से 18 साल के किशोरों पर बालिगों की तरह मुकदमा चलाने की इजाजत देता है, लेकिन ऐसा उनकी क्षमता और हालात की सावधानीपूर्वक शुरुआती जांच के बाद ही किया जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि रिस्टोरेटिव जस्टिस (सुधारात्मक न्याय) यह मांग करता है कि जिस किशोर ने नुकसान पहुंचाया है। वह उसे समझे और उसकी भरपाई में मदद करे। यह एक्ट हमसे उस नुकसान को भूलने के लिए नहीं कहता जो हुआ हो सकता है। यह हमें यह याद रखने के लिए कहता है कि जिसने नुकसान पहुंचाया है, वह अभी भी एक बच्चा है। एक्ट में ट्रेन्ड पुलिस अधिकारियों और बोर्ड के सदस्यों की जरूरत और हर मामले में सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट की मांग करके इस बात का ध्यान रखा गया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ऐसी समझ सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट पर भी निर्भर करती है, जो अक्सर एकमात्र ऐसा दस्तावेज होता है जो बोर्ड को बताता है कि युवा व्यक्ति कौन है, न कि यह कि उस पर क्या करने का आरोप है। यही कारण है कि नालसा की 2024 की चाइल्ड-फ्रेंडली लीगल सर्विसज स्कीम में पुलिस स्टेशन में एक वकील और हर बोर्ड में एक लीगल सर्विस क्लिनिक की व्यवस्था की गई है। मैं हमारे लीगल सर्विसेज संस्थानों से आग्रह करूंगा कि वे बच्चों के लिए ट्रेन्ड डिफेंस काउंसिल (बचाव पक्ष के वकील) की एक अलग विंग बनाने पर विचार करें ताकि उनमें से हर एक के पास पहले ही घंटे से एक समर्पित वकील हो, और वही वकील पुलिस स्टेशन से लेकर अंतिम आदेश और पुनर्वास तक उनकी मदद करता रहे।

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