‘उत्पादन से समृद्धि तक’ : भारतीय कृषि की नई विकास यात्रा

शिवराज सिंह चौहान

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों में भारतीय कृषि एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। पहले हमारी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि देश में अनाज की कमी न हो, किसी तरह भूख से बचाव हो जाए। आज मोदी जी की दूरदर्शिता और किसान‑हितैषी नीतियों ने कृषि को सिर्फ ‘उत्पादन का क्षेत्र’ नहीं रहने दिया, बल्कि किसान की समृद्धि, जोखिम‑सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, हरित तकनीक और ग्रामीण विकास का समन्वित आधार बना दिया है। हरित क्रांति के बाद पहली बार नीतियों का फोकस केवल ‘कितना उत्पादन’ पर नहीं, बल्कि ‘किसान की वास्तविक आय कितनी, खेती कितनी टिकाऊ, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कितनी मज़बूत’ पर आ गया है। इसी सोच से दलहन–तिलहन मिशन, कॉटन मिशन, प्राकृतिक खेती मिशन, प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना, खेत बचाओ अभियान, डिजिटल कृषि और शोध–नवाचार; सबको एक ही व्यापक दृष्टि से जोड़ा जा रहा है।

आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में 3765.63 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर है, जो देश के इतिहास में सबसे ज्यादा है। धान, गेहूँ, मक्का, दालें और तिलहन- सभी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है। यह केवल ज्यादा पैदावार नहीं, बल्कि कुल ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आए विस्तार और मजबूती का प्रमाण है। साथ‑साथ, मोदी सरकार ने किसान की जोखिम‑सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के तहत अब तक 22 किस्तों के माध्यम से किसानों के खातों में सीधे 4.27 लाख करोड़ रुपए से अधिक की सहायता पहुँच चुकी है, जिससे 9 करोड़ से ज़्यादा किसान परिवारों को हर साल नियमित आय‑समर्थन मिलता है। वहीं, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) ने देशभर में करोड़ों किसान‑आवेदनों को कवर करते हुए फसल के नुकसान की स्थिति में एक मज़बूत बीमा कवच दिया है। सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, कृषि‑अवसंरचना, वेयरहाउस और कोल्ड-चेन में निवेश ने उत्पादन, भंडारण और बाज़ार तक पहुँच- तीनों को मजबूत किया है। कृषि अब सिर्फ खेत की मेड़ तक सीमित नहीं है। डेयरी, मत्स्य, कुक्कुट, बागवानी, मधुमक्खी‑पालन, खाद्य‑प्रसंस्करण, भंडारण, ग्रामीण उद्योग, सौर ऊर्जा और सेवा‑क्षेत्र; सब मिलकर नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं।

लंबे समय तक दालें, खाद्य तेल और कपास-तीनों क्षेत्र हमारी पूरी क्षमता से पीछे रहे। हम दालों और तेलों के लिए आयात पर निर्भर रहे और कपास में भी किसानों को वैश्विक उतार‑चढ़ाव का सामना करना पड़ा। मोदी सरकार ने इन तीनों को रणनीतिक प्राथमिकता देते हुए अलग-अलग मिशन के रूप में आगे बढ़ाया है। राष्ट्रीय दलहन मिशन के माध्यम से तुअर, उड़द, मसूर, चना और अन्य दालों का क्षेत्र और उत्पादकता बढ़ाने के लिए बीज से लेकर बाज़ार तक पूरी वैल्यू चेन पर काम हो रहा है- उच्च‑उपज किस्में, क्लस्टर आधारित खेती, प्रसंस्करण इकाइयाँ, एमएसपी का सुदृढ़ ढाँचा, सरकारी खरीद, भंडारण और निर्यात तक। लक्ष्य यह है कि भारत दालों में पूरी तरह आत्मनिर्भर बने, आयात बिल घटे और किसानों को उच्च मूल्य वाली इन फसलों से स्थायी आय मिले। इसी तरह तिलहन मिशन के ज़रिए सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल और पाम ऑयल जैसी फसलों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यह केवल पैदावार बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता, किसानों को बेहतर दाम और देश की तेल सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में व्यापक रणनीति है। इसके साथ‑साथ कॉटन मिशन के तहत कपास की उच्च‑उपज और कीट‑रोधी किस्में, उन्नत कृषि‑प्रणालियाँ, कीट‑प्रबंधन, फसल विविधीकरण, टेक्सटाइल वैल्यू-चेन से बेहतर जुड़ाव और गुणवत्ता सुधार पर काम हो रहा है। कपास भारत के लाखों किसानों के लिए नकदी फसल है; मिशन का उद्देश्य है कि किसान को उत्पादन के साथ‑साथ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा योग्य गुणवत्ता, बेहतर मूल्य और स्थिर आय भी मिल सके।

तेज़ी से बढ़ती रासायनिक निर्भरता, मिट्टी की थकान और भूजल पर दबाव- ये सब हमें आगाह कर रहे हैं कि खेती के तरीके बदलने होंगे। इसी समझ के साथ हमारे विजनरी प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में प्राकृतिक खेती को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। हमारा संकल्प है कि 1 करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए सेंसिटाइज़ किया जाए, उनमें से लगभग 18 लाख किसानों को सक्रिय रूप से प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए तैयार किया जाए और चरणबद्ध रूप से करीब 75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाया जाए।

यह परिवर्तन धीरे‑धीरे, वैज्ञानिक प्रमाणों और किसानों के अपने अनुभव के आधार पर आगे बढ़ रहा है। छोटे किसानों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे अपनी कुछ भूमि पर प्राकृतिक खेती का मॉडल बनाकर देखें; उन्हें प्रशिक्षण, स्थानीय संसाधनों पर आधारित पैकेज, प्रमाणन, ब्रांडिंग और बाज़ार‑जुड़ाव में मदद दी जा रही है। उद्देश्य यह है कि मिट्टी की उर्वरता बढ़े, रासायनिक लागत घटे, जलवायु झटकों के सामने फसलें अधिक टिकाऊ हों और उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यप्रद, पोषक भोजन मिल सके।

भारत जैसे विशाल देश में कुछ क्षेत्र बहुत तेज़ी से आगे बढ़ते हैं, जबकि कुछ ज़िले अलग‑अलग वजहों से पीछे रह जाते हैं। इस असमानता को कम करने के लिए प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना की संकल्पना की गई है। इस योजना के तहत लगभग 100 कम उत्पादन वाले ज़िलों की पहचान की गई है, जहाँ प्रति हेक्टेयर पैदावार राष्ट्रीय औसत से काफी कम है और किसान अपेक्षित लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इन ज़िलों में 11 विभागों की 36 योजनाओं का कन्वर्जेन्स कर एक समग्र पैकेज दिया जा रहा है- सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य, बीज, उर्वरक, फसल विविधीकरण, पशुपालन, बागवानी, कृषि-उपकरण, कौशल विकास, अवसंरचना और बाज़ार-जुड़ाव; सबको एक साथ जोड़कर। सोच यह है कि योजनाएँ अलग‑अलग ‘साइलो’ में न चलें, बल्कि किसान के खेत और गाँव को केंद्र में रखकर सब मिलकर काम करें। इससे नीति का फोकस केवल ‘कितना उत्पादन’ से आगे बढ़कर इस पर आया है कि कहाँ उत्पादन कम है, वहाँ लक्षित निवेश और प्रयास से कैसे बढ़ाया जाए, और उससे किसान की आय कैसे ऊपर उठे।

उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में कई जगहों पर मिट्टी और पानी पर दबाव बढ़ा है। असंतुलित उर्वरक उपयोग, भूजल का अत्यधिक दोहन और सीमित फसल चक्र ने खेत की सेहत को प्रभावित किया है। यदि समय रहते दिशा न बदली जाए तो आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कमजोर खेत और थकी हुई मिट्टी छोड़ेंगे। इस चुनौती को देखते हुए ‘खेत बचाओ अभियान’ शुरू किया गया है। यह अभियान केवल मिट्टी बचाने का नहीं, बल्कि किसान की आय, भोजन की गुणवत्ता और भविष्य की खाद्य सुरक्षा की रक्षा का अभियान है। इसके पाँच मुख्य संदेश हैं- हर किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करे, डीएपी और यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कम करे और संतुलित एनपीके, सूक्ष्म पोषक तत्व, जैव एवं नैनो उर्वरकों को अपनाए, हरी खाद, जैविक खाद और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा दे, नकली बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के विरुद्ध सतर्क रहे और प्रशासन को तुरंत सूचना दे तथा प्राकृतिक खेती और जलवायु-अनुकूल पद्धतियों की ओर संगठित रूप से बढ़े। लक्ष्य यह नहीं कि उर्वरक अचानक कम कर दिए जाएँ, बल्कि यह है कि हर किसान सही मात्रा, सही समय और सही मिश्रण का उपयोग करे, ताकि मिट्टी की सेहत लंबे समय तक बनी रहे, लागत घटे और उत्पादन भी सुरक्षित रहे।

इन सभी प्रयासों की रीढ़ विज्ञान, अनुसंधान और डिजिटल तकनीक है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली ने 2014-25 के बीच लगभग 3,000 जलवायु‑सहनशील फसल किस्में विकसित की हैं, जिनमें सूखा, बाढ़, लू, लवणीयता और अन्य तनावों को झेलने की क्षमता है। कुल मिलाकर 3,800 से ज़्यादा उच्च‑उपज किस्में और 200 से अधिक बायोफोर्टिफाइड किस्में जारी की गई हैं, जो उत्पादकता के साथ‑साथ पोषण सुरक्षा भी मजबूत करती हैं। डिजिटल कृषि मिशन और ‘एग्रीस्टैक’ के तहत किसान पहचान, फसल प्लॉटों का डिजिटलीकरण, ड्रोन‑आधारित सेवाएँ, कीट‑रोग निगरानी, मौसम-आधारित और लोकेशन-स्पेसिफिक सलाह जैसी व्यवस्थाएँ बन रही हैं। इससे लैब से लैंड और डेटा से निर्णय तक की दूरी तेजी से कम हो रही है। ई‑नाम, किसान सारथी, केवीके नेटवर्क, मोबाइल संदेश, व्हाट्सऐप समूह, सामुदायिक रेडियो और सोशल मीडिया- इन सबके माध्यम से वैज्ञानिक, विस्तारकर्मी और किसान-नेता सीधे किसान से संवाद कर पा रहे हैं। कृषि और ग्रामीण विकास को भी एक साथ, समग्र दृष्टि से देखा जा रहा है। सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्व‑सहायता समूह, एफपीओ, ग्रामीण उद्योग और कौशल विकास- ये सभी कार्यक्रम जब कृषि के साथ कदम-ताल करके चलते हैं, तभी गाँवों में रोज़गार, उद्यमिता और सामाजिक परिवर्तन की गति बढ़ती है।

आने वाले वर्षों में भारत को दुनिया की खाद्य, पोषण और जलवायु चुनौतियों के बीच अपने कृषि‑तंत्र को और मजबूत बनाना है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का विज़न स्पष्ट है-किसान की आय बढ़े, उसकी मेहनत का उचित सम्मान और मूल्य मिले, दालों, तिलहनों और कपास में आत्मनिर्भरता से पोषण, तेल और वस्त्र सुरक्षा मजबूत हो। पीएम-किसान, पीएमएफबीवाई, प्राकृतिक खेती, खेत बचाओ अभियान और जलवायु‑अनुकूल तकनीकों से खेत की मिट्टी, पानी और किसान की सुरक्षा सुनिश्चित हो।प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के माध्यम से कम उत्पादन वाले ज़िलों में लक्षित निवेश से क्षेत्रीय असमानता घटे और हर किसान आगे बढ़े। विज्ञान, अनुसंधान और डिजिटल तकनीक से खेती कुशल, लचीली, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बने।

जब खेत बचेगा, तब किसान बचेगा। जब किसान बचेगा, तब कृषि बचेगी और जब कृषि बचेगी, तब भारत का भविष्य सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर बनेगा। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में यही हमारी नई कृषि यात्रा का सार है– फसल से आगे, किसान के विश्वास और ग्रामीण भारत की समृद्धि की ओर।

(लेखक केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री हैं।)

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