नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को वैवाहिक और वाणिज्यिक विवादों में शामिल पक्षकारों द्वारा व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने के लिए ‘तुच्छ और परेशान करने वाले’ आपराधिक मामले दायर करने की चिंताजनक प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की। शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालतों को ऐसे मामलों के प्रति सतर्क रहना चाहिए और उनकी पड़ताल सावधानीपूर्वक करनी चाहिए।
परेशान करने के लिए बिना ठोस आधार वाले मुकदमे दायर करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर ये टिप्पणियां न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने एक फैसले में कीं। पीठ ने अपने इस फैसले में उस आपराधिक शिकायत को रद्द कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 14 वर्षीय एक किशोरी के साथ उसके पिता और चाचा ने बलात्कार किया था।
पचास पृष्ठों का फैसला लिखने वाली जस्टिस नागरत्ना ने कहा, हम एक चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं, जो हमारे संज्ञान में आई है। वैवाहिक या वाणिज्यिक संबंधों में शामिल पक्षकार आपसी दुश्मनी और व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने के लिए आपराधिक प्रकृति के तुच्छ और परेशान करने वाले दावे और आरोप लगाने का सहारा ले रहे हैं और इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कुत्सित/अनैतिक साधनों का सहारा ले रहे हैं। इसमें कहा गया है कि पति-पत्नी के बीच इस तरह के अस्पष्ट और परेशान करने वाले मुकदमों से अदालतों का दुरुपयोग हो रहा है और उन पर बोझ बढ़ रहा है, क्योंकि कई बार बदला लेने के लिए कानून और पुलिस का सहारा अप्रत्यक्ष या गलत तरीके से दूसरे जीवनसाथी और उनके परिवार के सदस्यों को परेशान करने, उन पर दबाव डालने और उन्हें प्रताड़ित करने के लिए लिया जाता है।
मामले के तथ्यों का हवाला देते हुए, अदालत ने कहा कि आरोपी पिता और अलग रह रही उसकी पत्नी, जो कथित पीड़िता की मां है, के बीच वैवाहिक विवाद जारी था और दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ लगभग 10 मामले दायर किए थे।
प्राथमिकी रद्द करते हुए, फैसले में बलात्कार की शिकायत के पक्ष में प्रस्तुत साक्ष्यों की पड़ताल की गई और कहा गया कि इसमें ‘झूठे, निराधार और परेशान करने वाले’ आरोप शामिल हैं। हालांकि, पीठ ने आगाह करते हुए कहा, हम इस तथ्य से अवगत हैं कि ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां महिलाएं वैवाहिक विवादों और हिंसा से गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं, जिसे उन्हें पति, ससुराल वालों और परिवार के अन्य सदस्यों के हाथों सहना पड़ता है।
पीठ ने कहा गया है कि ऐसे मामलों पर पूरा ध्यान और न्यायिक पड़ताल होनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति हो और अपराधी बिना किसी सजा के ना छूटें, बल्कि उन्हें वह सजा मिले, जिसके वे हकदार हैं। पीठ ने कहा कि वह इस तथ्य से अवगत है कि नाबालिगों के साथ बलात्कार और यौन शोषण तथा महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा मानव स्वभाव के सबसे जघन्य और हिंसक उदाहरणों में से हैं, जो समाज की अंतरात्मा और नैतिक संरचना को झकझोर देते हैं।
पीठ ने कहा, इसलिए, अदालतों और सार्वजनिक अधिकारियों को ऐसे अपराधों के अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए और न्याय के हित में ऐसे मामलों को शीघ्रता और सख्ती से निपटाया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि ऐसे वास्तविक मामले भी हैं, जहां पीड़ित पक्ष अपने जीवनसाथी के कृत्यों से राहत और मुक्ति की तलाश में हैं।
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