अपनी जड़ों से जुड़ें युवा : प्रिंस ग्यालसे

छोग्याल पाल्देन थोंडुप नामग्याल की 103वीं जयंती मनी

गंगटोक : गंगटोक के देवराली स्थित Namgyal Institute of Tibetology (एनआईटी) के संस्थापक अध्यक्ष छोग्याल पाल्देन थोंडुप नामग्याल (Chogyal Palden Thondup Namgyal) की 103वीं जयंती पर आज संस्थान का स्थापना दिवस श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया गया।

कार्यक्रम में प्रिंस ग्यालसे पाल्देन ग्युरमेद नामग्याल (Prince Gyalsey Palden Gyurmed Namgyal) मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ धार्मिक विभाग के मंत्री वेन सोनम लामा, मार्तम-रुमटेक के विधायक सोनम वेन्चुंग्पा, मुख्यमंत्री के सलाहकार कुंगा नीमा लेप्चा, अतिरिक्त राजनीतिक सलाहकार छिरिंग वांग्चुक लेप्चा, एनआईटी निदेशक डॉ पासांग डी फेम्पू, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष केटी ग्यालछेन  (KT Gyaltsen) सहित कई गणमान्य लोग, विद्वान और छात्र मौजूद रहे।

इस अवसर पर अपने संबोधन में प्रिंस ग्यालसे ने एनआईटी को केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि सिक्किम और हिमालयी क्षेत्र की आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने वाला जीवंत केंद्र बताया। उन्होंने संस्थापक नामग्याल के विजन पर बात करते हुए कहा कि चोग्याल पाल्देन थोंडुप नामग्याल ने समय रहते समझ लिया था कि संकट में पड़ी संस्कृतियों को दस्तावेजीकरण, शोध और जनभागीदारी के माध्यम से अगली पीढिय़ों तक पहुंचाना जरूरी है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि छोग्याल की विरासत के राजनीतिक इतिहास से कहीं आगे तक फैली होने की बात कहते हुए एक आधुनिक, संस्थान निर्माता और सिक्किमी पहचान के रक्षक के तौर पर उनकी भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन, उद्योग-धंधों और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व में छोग्याल के योगदान के बारे में बात की और राज्य की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा करने के बारे में भी बताया।

वहीं, प्रिंस ग्यालसे ने युवाओं से अपनी जड़ों से जुड़ने की अपील करते हुए कहा कि संस्कृति केवल स्मृति या समारोहों से जीवित नहीं रह सकती, बल्कि उसे सरल और रोचक तरीके से नई पीढ़ी तक पहुंचाना होगा। उन्होंने सिक्किम की पवित्र और ऐतिहासिक विरासत पर वृत्तचित्रों तथा बच्चों के लिए सामुदायिक शिक्षण कार्यक्रम शुरू करने की योजना की भी जानकारी दी।

इसके साथ ही, भावी पहलों के बारे में बताते हुए प्रिंस ने सिक्किम की पवित्र और ऐतिहासिक विरासत पर डॉक्यूमेंट्री सीरीज बनाए जाने की जानकारी दी। उन्होंने आगे सिक्किम के आध्यात्मिक इतिहास की कई अनकही कहानियों और ज़्यादा पहचान मिलनी चाहिए। उन्होंने “संडे स्कूल” की अवधारणा से प्रेरित कम्युनिटी-बेस्ड लर्निंग प्रोग्राम शुरू करने की योजना भी बताई।

प्रिंस ने आगे कहा कि नई बनी चोग्याल पाल्देन थोंडुप नामग्याल चेयर सिक्किम के इतिहास, पवित्र भूगोल और सांस्कृतिक पहचान के बारे में रिसर्च और लोगों की समझ को बढ़ावा देने की दिशा में काम करेगी। उन्होंने कहा कि इसका बड़ा मकसद एनआईटी जैसे संस्थान में रखे गए समृद्ध जानकारियों को नई पीढ़ी और आम लोगों के लिए ज़्यादा आसान और रिलेटेबल बनाना है। वहीं, उन्होंने सिक्किम की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को बचाने और बढ़ावा देने के लिए राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर और मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग के लगातार समर्थन के लिए आभार जताया।

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार सुनंद के. दत्ता-रे (Sunanda K. Datta-Ray) का स्मृति व्याख्यान रहा। उन्होंने छोग्याल के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों और सिक्किम के राजनीतिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक सफर पर प्रकाश डाला। उन्होंने छोग्याल को दूरदर्शी, आधुनिक सोच वाला और सिक्किम की विशिष्ट पहचान का संरक्षक बताया।

1960 के दशक में छोग्याल के साथ अपनी शुरुआती मुलाकातों को याद करते हुए दत्ता-रे ने उन्हें एक मिलनसार, आसानी से मिलने वाला और दूरदर्शी सोच वाला नेता बताया, जिनका लोगों के साथ रिश्ता प्रोटोकॉल और फॉर्मैलिटी से कहीं ज़्यादा था। उन्होंने कहा कि छोग्याल का अंतरराष्ट्रीय नजरिया बड़ा था और उन्होंने सिक्किम को एक आधुनिक हिमालयी राज्य के तौर पर देखा था, जो अपनी खास पहचान और परंपराओं को बनाए रखते हुए दुनिया भर के साथ कॉन्फिडेंस के साथ जुड़ सके।

इस अवसर पर ‘सिक्किम में बुद्धिज्म के 50 साल : इतिहास, संस्कृति एवं चुनौतियां’ और ‘ए गाइड टू हॉली बुद्धिस्ट साइट इन सिक्किम’ नामक दो पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। साथ ही, सुनंद के दत्ता-रे को साहित्य, पत्रकारिता और ऐतिहासिक विमर्श में योगदान के लिए सेंटेनियल मेडल ऑफ ऑनर से सम्मानित किया गया।

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