भारत-वियतनाम रिश्तों को नई मजबूती : रक्षा सहयोग हमारी रणनीतिक साझेदारी का अहम स्तंभ : राजनाथ सिंह

नई दिल्ली । रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अपने आधिकारिक वियतनाम दौरे पर हैं। इस दौरान उन्होंने मंगलवार को वहां वियतनाम के जनरल सेक्रेटरी व राष्ट्रपति तो लाम से मुलाकात कर भारत-वियतनाम संबंधों को और मजबूत बनाने पर व्यापक चर्चा की। बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम से की मुलाकात के दौरान रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। मुलाकात के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि वियतनाम के जनरल सेक्रेटरी और राष्ट्रपति तो लाम से मिलकर उन्हें सम्मान की अनुभूति हुई।

राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुभकामनाएं भी पहुंचाईं और इस बात को दोहराया कि भारत, वियतनाम के साथ रक्षा सहयोग को और गहरा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि रक्षा सहयोग, भारत और वियतनाम के बीच ‘एन्हांस्ड कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

बहरहाल, भारत और वियतनाम के संबंधों को इस बात से समझा जा सकता है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका को चेताया था कि वो वियतनाम से निकल जाए। उस दौरान भारत ने वियतनाम युद्ध में अमेरिकी दखल का विरोध किया।

वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर लिखती हैं कि नेहरू ने नवंबर 1961 में अमेरिका की अपनी आखिरी राजकीय यात्रा की। हैमरस्मिथ फार्म में एक निजी भोज के दौरान, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी और भारत में अमेरिकी राजदूत जॉन केनेथ गैलब्रेथ ने नेहरू से पूछा कि वे वियतनाम में अमेरिकी सैन्य दखल से कैसे बच सकते हैं। हालांकि नेहरू वियतनाम युद्ध को लेकर कोई स्पष्ट राय नहीं रख पाए लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका को इससे (वियतनाम युद्ध) बाहर ही रहना चाहिए। नेहरू के भतीजे और उस समय अमेरिका में भारत के राजदूत रहे ब्रज कुमार नेहरू के अनुसार, प्रधानमंत्री ने बाद में विदेश सचिव एम. जे. देसाई से कहा, उनसे (केनेडी से) कहो, उनसे कहो कि वे वियतनाम में न जाएं। वे वहां फंस जाएंगे और फिर कभी वहां से निकल नहीं पाएंगे।

नेहरू की बात सही साबित हुई। इस युद्ध की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इसमें करीब 9,70,000 से लेकर 30 लाख वियतनामी सैनिकों और नागरिक मारे गए। लगभग 2,75,000–3,10,000 कंबोडियाई, 20,000–62,000 लाओस के लोगों को जान गंवानी पड़ी वहीं 58,220 अमेरिकी सैनिक मारे गए। अंत में 1972 में वियतनाम युद्ध से अमेरिका को पीछे हटना पड़ा। युद्ध समाप्त होने के बाद उत्तर और दक्षिण वियतनाम एक देश बने।

तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 1959 में उत्तरी वियतनाम का दौरा किया। प्रसाद ने हो ची मिन्ह से मुलाकात की और उन्हें एक बोधि वृक्ष (पीपल का पेड़) भेंट किया, जिसे उन्होंने हनोई के सबसे पुराने बौद्ध मंदिर, ट्रान क्वोक पैगोडा में लगाया। यह वियतनाम का पहला बोधि वृक्ष है, और तब से यह दोनों देशों के बीच दोस्ती का प्रतीक बन गया है। 22 दिसंबर 2019 को, वियतनाम के बौद्ध संघ और हनोई में भारतीय दूतावास ने इस पेड़ को लगाए जाने की 60वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक समारोह आयोजित किया। सितंबर 2014 में भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की वियतनाम यात्रा के दौरान, उन्होंने राष्ट्रपति ट्रुओंग टैन सांग को दूसरा बोधि वृक्ष भेंट किया, जिसे उन्होंने हनोई में राष्ट्रपति भवन में लगाया।

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