गंगटोक : संरक्षण मानवाधिकार अधिनियम, 1993 के तहत वर्ष 2008 में गठित सिक्किम राज्य मानवाधिकार आयोग को सरकार से नियमित वित्तीय सहायता मिल रही है, लेकिन आयोग की हालिया वार्षिक रिपोर्टों में दर्ज बेहद कम शिकायतों ने उसकी जनपहुंच और आम लोगों के बीच जागरुकता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आयोग की वर्ष 2022-23 और 2024-25 की वार्षिक रिपोर्टों की तुलना से पता चलता है कि दोनों अवधियों में हर साल केवल दो से तीन नई शिकायतें ही दर्ज हुईं। वर्ष 2022-23 में चार मामलों का निपटारा किया गया था, जबकि 2024-25 में दो मामलों का निपटारा हुआ और एक मामला खारिज किया गया। छह लाख से अधिक आबादी वाले सिक्किम में शिकायतों की इतनी कम संख्या को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या राज्य में मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामले वास्तव में बेहद कम हैं या फिर लोगों को आयोग और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया की पर्याप्त जानकारी नहीं है।
आयोग को सिविल अदालत के समान कई वैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। वह गवाहों को तलब कर सकता है, दस्तावेज मांग सकता है और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है। इसके बावजूद उपलब्ध वार्षिक रिपोर्टों में गांव स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम, स्कूलों में अभियान या व्यापक जनसंपर्क जैसी नियमित पहलों का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। रिपोर्टों में कथित मारपीट, हिरासत से जुड़ी शिकायतों और पारिवारिक विवादों के कुछ मामले कई रिपोर्टिंग अवधियों से लंबित रहने की बात भी सामने आती है। कुछ मामलों के निपटारे में कई वर्ष लगने की स्थिति आयोग की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न खड़े करती है।
वहीं, अन्य छोटे राज्यों से तुलना करने पर सिक्किम की स्थिति और उल्लेखनीय दिखती है। हाल के एक वर्ष में गोवा में सौ से अधिक नई शिकायतें दर्ज की गईं, जबकि त्रिपुरा मानवाधिकार आयोग में भी शिकायतों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। ऐसे में, केवल कम आबादी को शिकायतों की कम संख्या का कारण मानना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञों के अनुसार आयोग तक आसान पहुंच, लोगों में जागरूकता और संस्था पर भरोसा बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
सिक्किम को शांत और अपेक्षाकृत कम अपराध वाला राज्य माना जाता है, जो कम शिकायतों का एक कारण हो सकता है। फिर भी बड़ा सवाल यही है कि क्या वास्तव में अधिकारों से जुड़ी शिकायतें कम हैं, या लोगों को यह पता ही नहीं कि न्याय और शिकायत निवारण के लिए आयोग तक कैसे पहुंचा जाए।
बहरहाल, यह स्थिति मानवाधिकार आयोग की जनपहुंच बढ़ाने, जागरूकता अभियान चलाने और शिकायत प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाने की जरूरत की ओर संकेत करती है।
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