संसद में 12 अगस्त से एफसीआरए संशोधन बिल पर चर्चा संभव, विपक्ष ने जताई आशंका

नई दिल्ली । सरकार इसी सत्र में एफसीआरए (संशोधन) बिल (एफसीआरए) पास कराने के लिए पेश कर सकती है। 12 अगस्त से सदन में इस बिल पर चर्चा होने की संभावना है। इससे पहले गृह मंत्री अमित शाह अलग अलग मीटिंग्स कर इस बिल पर सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस संशोधन बिल को लेकर विपक्ष विरोध कर रहा है। गुरुवार को भी गृह मंत्री ने क्रिश्चियन समुदाय के अलग अलग लोगों से मुलाकात कर इस बिल पर बात की। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा भी गृह मंत्री से मिले।

गृह मंत्री से मुलाकात के बाद लालदुहोमा ने कहा कि हमने गृह मंत्री के सामने छह मुद्दे उठाए। इनमें से एक मुद्दे पर उन्होंने भरोसा दिलाया कि इस बिल को पिछली तारीख से लागू (रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट) नहीं किया जाएगा। बाकी जिन मुद्दों को हमने उठाया है उन पर उन्होंने कहा कि वह हमें लिखित जवाब देंगे। वह जवाब मिलने के बाद ही हमें पूरी स्थिति स्पष्ट होगी। मिजोरम सीएम के मुताबिक हमे यह भी बताया गया कि इस महीने की 12 तारीख से संसद में एफसीआरए बिल पर चर्चा शुरू होगी।

एफसीआरए यानी फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट 2010 ऐसा कानून है, जो भारत में विदेश से मिलने वाले चंदे को नियंत्रित करता है। यह कानून उन संस्थाओं पर लागू होता है, जो विदेश से आर्थिक मदद लेती हैं। इनमें एनजीओ, ट्रस्ट, सोसाइटी, शैक्षणिक संस्थाएं, धार्मिक संगठन जैसे संस्थान शामिल हैं। अगर कोई संस्था विदेश से चंदा लेना चाहती है तो उसे गृह मंत्रालय से एफसीआरए रजिस्ट्रेशन या पहले से इजाजत लेनी होती है। एफसीआरए रजिस्ट्रेशन 5 साल के लिए मान्य होता है। इसके बाद इसे वक्त वक्त पर रिन्यू कराना पड़ता है। यह कानून यह भी तय करता है कि विदेशी धन कैसे लिया जाएगा, उसका इस्तेमाल कैसे होगा, उसका हिसाब-किताब कैसे रखा जाएगा और सरकार को उसकी जानकारी कैसे दी जाएगी।

सरकार का कहना है कि एफसीआरए अमेंडमेंट बिल के जरिए हम मौजूदा कानून की जो कमियां हैं, उसे दूर करना चाहते हैं। अगर किसी संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाए या संस्था खुद उसे वापस कर दे या समय पर रिन्यू न होने से समाप्त हो जाए तो उस संस्था ने विदेशी धन से जो संपत्तियां बनाई हैं, उनके प्रबंधन को लेकर अभी स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। इससे हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियां लंबे समय तक कानूनी अनिश्चितता में फंस जाती हैं।

सरकार का कहना है कि इसी कमी को दूर करने के लिए संशोधन प्रस्तावित किया गया है। बिल में सबसे बड़ा प्रस्ताव यह है कि सरकार एक ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी’ नियुक्त करेगी। अगर किसी संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, वह सरेंडर कर देती है या उसका नवीनीकरण नहीं होता तो यह अथॉरिटी उस संस्था के पास मौजूद विदेशी चंदे और विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियों का प्रबंधन संभालेगी। बिल में यह भी प्रस्तावित है कि अगर किसी संस्था ने पिछले दो वित्तीय वर्षों में विदेशी चंदे के रूप में 10 लाख रुपये से कम राशि प्राप्त की है या उसका उपयोग किया है, तो वह एफसीआरए रजिस्ट्रेशन के नवीनीकरण के लिए पात्र नहीं हो सकती।

विपक्षी दलों, कई सामाजिक संगठनों और कुछ ईसाई संगठनों ने इस संशोधन का विरोध किया है। डिजाइनेटेड अथॉरिटी वाले प्रावधान को लेकर विरोध है। विरोध करने वालों का कहना है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन खत्म होता है तो सरकार द्वारा नियुक्त अथॉरिटी को विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार मिल जाएगा। इससे सरकार को विदेशी चंदे से बने स्कूल, अस्पताल, धर्मार्थ संस्थानों और पूजा स्थलों जैसी संपत्तियों पर व्यापक अधिकार मिल सकते हैं।

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