नामची : दक्षिण सिक्किम का सिरिसे गांव देसी ऑर्किड संरक्षण के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरा है। पिछले तीन वर्षों से ग्रामीणों, युवाओं, ऑर्किड प्रेमियों और संरक्षणकर्ताओं के संयुक्त प्रयासों के बाद अब सिरिसे गांव के प्रत्येक घर में कम से कम एक देशी ऑर्किड प्रजाति लगाई जा चुकी है। इस उपलब्धि के साथ सिरिसे ऑर्किड विलेज ने शत-प्रतिशत घरेलू भागीदारी का लक्ष्य हासिल कर लिया है।
इस पहल का नेतृत्व वनस्पति शोधकर्ता प्रमोद राई ने किया। उनके साथ गांव के युवाओं भास्कर राई, संजय राई, सुजन राई, श्रवण राई, उदय लिम्बू, सजल राई सहित अन्य स्वयंसेवकों ने सक्रिय भूमिका निभाई। यह समूह लंबे समय से सामाजिक और पर्यावरणीय गतिविधियों से जुड़ा रहा है, जिसमें देशी ऑर्किड संरक्षण इसकी प्रमुख पहलों में से एक है।
इसी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए डोंग हेवेनली पाथ ऑर्गनाइजेशन और डोंग-सिरिसे विलेज यूथ्स के संयुक्त तत्वावधान में यहां एक दिवसीय देशी ऑर्किड संरक्षण अभियान आयोजित किया गया। इस अभियान के तहत 29 प्रजातियों और 11 प्रकारों के कुल 630 ऑर्किड पौधे तैयार कर ग्रामीणों में वितरित किए गए। इनमें डेंड्रोबियम नोबिले, जो सिक्किम का राज्य पुष्प है, डेंड्रोबियम एफाइलम वरायटी अल्बा, कोएलोगाइने विस्कोसा, कोएलोगाइने बारबाटा, अरैक्निस क्लार्केई और वांडा प्यूमिला जैसी प्रमुख प्रजातियां शामिल थीं।
इन पौधों को डॉ नयन बोखिम, दिनेश छिरिंग भूटिया और प्रमोद राई ने उपलब्ध कराया। डॉ बोखिम और भूटिया नामची के अनुभवी ऑर्किड उत्पादक हैं और चार दशकों से अधिक समय से देशी ऑर्किड के एक्स-सीटू संरक्षण से जुड़े हुए हैं। वे नामची फ्लावर शो आंदोलन के शुरुआती योगदानकर्ताओं में भी शामिल रहे हैं।
अभियान के दौरान लगाए गए अधिकतर ऑर्किड एपिफाइटिक प्रजातियों के थे, जो प्राकृतिक रूप से पेड़ों के तनों पर उगते हैं। 17 स्वयंसेवकों की टीम ने सिरिसे-थम्पोंग गांव के सभी 75 घरों का दौरा किया। टीम ने प्रत्येक घर में उपयुक्त पेड़ों की पहचान की और पारिस्थितिक अनुकूलता के आधार पर दो से तीन ऑर्किड प्रजातियों को पेड़ों पर स्थापित किया। साथ ही परिवारों से मेजबान पेड़ों और लगाए गए ऑर्किड पौधों की सुरक्षा की अपील की गई।
कार्यक्रम का उद्घाटन डेंचुंग डोंग जीपीयू के अंतर्गत सिरिसे-थम्पोंग वार्ड की वार्ड पंचायत योश्निता यांगमा राई की उपस्थिति में किया गया। वे इस पहल की शुरुआत से ही इसे समर्थन देती रही हैं। अभियान में घर-घर दौरे के दौरान स्वयंसेवकों ने लोगों को ऑर्किड संरक्षण के महत्व और प्राकृतिक आवासों से अंधाधुंध पौधे निकालने के नुकसान के बारे में भी जागरूक किया। अभियान में उपयोग किए गए पौधे मुख्य रूप से गिरे हुए पेड़ों से बचाए गए नमूनों और जिम्मेदार उत्पादकों के बीच आदान-प्रदान के माध्यम से प्राप्त किए गए, ताकि जंगलों में मौजूद प्राकृतिक ऑर्किड आबादी को कोई नुकसान न पहुंचे।
गौरतलब है कि भारत का दूसरा सबसे छोटा राज्य होने के बावजूद सिक्किम में लगभग 532 ऑर्किड प्रजातियां पाई जाती हैं। यही कारण है कि सिक्किम देश के सबसे समृद्ध ऑर्किड क्षेत्रों में गिना जाता है। हालांकि तेजी से हो रहे विकास कार्यों के कारण जैव विविधता पर खतरा बढ़ रहा है। पेड़ों की कटाई को तो सामान्य रूप से पर्यावास के नुकसान के रूप में देखा जाता है, लेकिन पेड़ों पर उगने वाले एपिफाइटिक ऑर्किड की क्षति अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है। ऑर्किड को पर्यावरणीय स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है, क्योंकि इनका संबंध माइकोराइजल फफूंद, परागणकर्ताओं और आसपास के पर्यावरणीय बदलावों से गहराई से जुड़ा होता है।
सिरिसे के लोगों का ऑर्किड से संबंध कई पीढिय़ों पुराना है। गांव के बुजुर्ग आज भी एक स्थानीय ऑर्किड प्रेमी को याद करते हैं, जिन्हें लोग प्यार से “ऑर्किड साइला” (ऑर्किड मैन) के नाम से जानते थे। वे गांव के लोगों में देशी ऑर्किड बांटते थे और ऑर्किड के प्रति लगाव को बढ़ावा देते थे। स्थानीय राई और लिम्बू समुदाय की परंपराओं में भी ऑर्किड का विशेष स्थान रहा है। वे डेंड्रोबियम मोस्काटम के तने के रेशों से रस्सी तैयार करते थे, जिसका उपयोग पारंपरिक आभूषण “धजुरा” बनाने में किया जाता था। इससे स्पष्ट है कि सिरिसे में ऑर्किड संरक्षण केवल पर्यावरणीय अभियान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा जन आंदोलन है।
सिरिसे वनस्पति दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां क्लोरोफाइटम सिक्किमेंस जैसी दुर्लभ प्रजाति पाई जाती है, जो वर्तमान में केवल सिरिसे से ही ज्ञात है। इसके अलावा यूलेफिया सायामेंसिस नामक स्थलीय ऑर्किड की भारत में पुष्टि की गई एकमात्र आबादी भी इसी गांव से रिपोर्ट की गई है।
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