भावी पीढि़यों के लिए सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण जरूरी : Sonam Tshering Venchungpa

गंगटोक : गंगटोक के नामग्याल इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्‍ब्‍तेलॉजी (एनआईटी) में आज “हिमालय की महान महिलाएं-एलेक्जेंड्रा डेविड-नील की स्मृति में उनके पदचिह्नों पर” शीर्षक से दो दिवसीय एक संगोष्ठी आयोजित की गई। आज यहां बौद्ध संन्यासियों की प्रार्थना के साथ उद्घाटन सत्र की शुरुआत हुई, जिसमें रुमटेक-मार्तम के विधायक सोनम छिरिंग वेंचुग्पा और श्रद्धेय क्याबजे लाचेन डुंगसे ओंगदालक रिंपोछे क्रमश: मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लिया।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि Sonam Tshering Venchungpa ने इस कार्यक्रम को बौद्ध धर्म और हिमालयी क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराओं को दर्शाने वाला बताते हुए एलेक्जेंड्रा डेविड-नील के जीवन और योगदान पर बात की। उन्होंने, सिक्किम के साथ उनके जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्र की महिलाओं ने अपने कार्यों, ज्ञान और जिम्मेदारियों के माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने भावी पीढि़यों के लिए सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान प्रणालियों को संरक्षित करने के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए अपनी उपस्थिति और योगदान के लिए राजदूतों, प्रतिनिधियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

वहीं, श्रद्धेय क्याबजे लाचेन डुंगसे ओंगदालक रिंपोछे ने संगोष्ठी आयोजित करने के लिए नामग्याल इंस्टीट्यूट ऑफ तिबेटोलॉजी की सराहना की और नैतिक आचरण का मार्गदर्शन करने तथा समकालीन समाज में संतुलन बनाए रखने में आध्यात्मिक परंपराओं के महत्व पर बात की। रिंपोछे ने कहा कि बौद्ध धर्म की शिक्षाएं आज की चुनौतियों का सामना करने में दिशा प्रदान करती रहती हैं। उन्होंने संवाद तथा सीखने के माध्यम से ज्ञान के संरक्षित और आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर देते हुए आगे कहा कि संगोष्ठी के दौरान हुई चर्चाएं सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं की समझ को मजबूत करने में योगदान देंगी तथा निरंतर शोध और चिंतन को प्रोत्साहित करेंगी।

कार्यक्रम में उपस्थित भारत में फ्रांस के राजदूत डॉ थियरी मैथ्‍यू ने अपने संबोधन में ऐसी शैक्षणिक पहल को सांस्कृतिक समझ और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि एलेक्जेंड्रा डेविड-नील का काम भारत और यूरोप के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का प्रतिनिधित्व करता है और एक साझा बौद्धिक विरासत को दर्शाता है। उन्होंने आगे कहा कि ऐसे मंचों के माध्यम से लगातार बातचीत अनुसंधान, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और राष्ट्रों के बीच आपसी समझ को बढ़ावा देती है।

इससे पहले, एनआईटी निदेशक डॉ पासांग डी फेम्पु ने अपने स्वागत भाषण में गणमान्य लोगों, विद्वानों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। उनके साथ, संस्थान की अनुसंधान सलाहकार एवं संगोष्ठी संयोजक डॉ अन्ना बालिकसी डेन्जोंग्पा ने इसकी विषय-वस्तु की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिसमें हिमालयी क्षेत्र में महिलाओं के योगदान की पड़ताल करने की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला गया। इसके अलावा, तकनीकी सत्र में जीन मास्कोलो डी फिलिपिस ने एलेक्जेंड्रा डेविड-नील पर, डॉ राहेल गुइडोनी ने लामा योंगडेन पर, डॉ जिग्मी वांग्चुक ने तीसरे लाचेन गोमचेन रिनपोछे पर और कात्या थॉमस राई ने हिमालयी महिलाओं के बारे में एलेक्जेंड्रा डेविड-नील की यादों पर प्रस्तुतियां दीं।

इसके बाद के सत्र में, डॉ अन्ना बालिकसी डेनजोंगपा द्वारा संचालित “हिमालय में शाही महिलाएं” विषय पर पहले सत्र में भारत में फ्रांस के राजदूत डॉ थियरी मैथ्‍यू ने रानी चोयिंग वांग्मो दोरजी पर और फ्रांकोइस पोमारेट ने भूटान की पहली शाही महिलाओं पर प्रस्तुतियां दीं। तत्पश्चात कात्या थॉमस राई ने “ए डेविड-नील और उनका सिक्किमी दायरा” विषय पर दूसरे सत्र का संचालन किया। इस दौरान, जीन मास्कोलो डी फिलिपिस और सैमुअल थेवोज ने सिक्किम में एलेक्जेंड्रा डेविड-नील पर, डॉ राहेल गुइडोनी ने “लामा योंगडेन का अविश्वसनीय एवं अज्ञात भाग्य” पर और डॉ जिग्मी वांग्चुक भूटिया ने “हिमालय से ज्ञान: लाचेन गोमचेन रिनपोछे और वज्रयान बौद्ध धर्म का प्रसार” पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम में भूटान की महारानी आशी केसांग वांग्मो वांग्चुक, सिक्किम उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एस.पी. वांगदी, सिक्किम के पुलिस महानिदेशक अक्षय सचदेवा, भारत में स्विट्जरलैंड की राजदूत माया तिसाफी, बेल्जियम के राजदूत डिडिएर वान्डेनहैसल्ट, फ्रेंच इंस्टीट्यूट के कंट्री डायरेक्टर ग्रेगोर ट्रूमेल, कोलकाता में फ्रांस के महावाणिज्य दूत थियरी मोरेल के साथ राज्य सरकारी अधिकारियों, कई देशों के प्रतिनिधियों और गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया। यह यह संगोष्ठी कल भी विभिन्न विषयगत सत्रों के साथ जारी रहेगी।

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