हिमनद झीलों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन शुरू

प्रकाश अधिकारी

गंगटोक : उत्तरी सिक्किम की खतरनाक और उच्च जोखिम वाली हिमनद झीलों का अध्ययन करने के लिए सिक्किम के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने कई केंद्रीय एवं राज्य सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर एक विस्तृत वैज्ञानिक अभियान शुरू किया है। यह अभियान दो वर्ष पहले 3-4 अक्टूबर को दक्षिण ल्होनक झील से उत्पन्न हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (जीएलओफ) जैसी आपदाओं को रोकने के प्रयासों के तहत इस वर्ष 20 अगस्त को शुरू हुआ था।

इस अध्ययन दल में केंद्रीय जल आयोग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान, केंद्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केंद्र, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान और सिक्किम विश्वविद्यालय जैसे राष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञों के साथ खान एवं भूविज्ञान विभाग, सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, वन विभाग, पुलिस और सूचना व जनसंपर्क विभाग जैसी राज्य एजेंसियां भी शामिल हैं।

साथ ही, इस अभियान को भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) का सहयोग भी प्राप्त है, जो उच्च-ऊंचाई वाले इलाकों में सभी प्रकार के वाहन, चिकित्सा सहायता और उपग्रह संचार प्रदान कर रहे हैं। प्राप्‍त जानकारी के अनुसार, अध्ययन के लिए रवाना हुई दो टीमों में से एक, विनाशकारी 2023 ग्लेशियल विस्फोट स्थल, ल्होनक झील के आसपास सर्वेक्षण करने के बाद वापस लौट आई है। वहीं, दूसरी टीम ल्होनक वैली और अन्य झीलों के ऊंचे इलाकों में अपना काम जारी रखे हुए है।

इस संबंध में आज यहां मीडिया से बात करते हुए सिक्किम सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव डॉ संदीप तांबे ने कहा कि राज्य में कुल 40 हिमनद झीलें (ग्लेशियर्स) हैं, जिनमें से 16 को उच्च-जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है।

उन्होंने आगे कहा कि सिक्किम को भविष्य में किसी और आपदा का सामना न करना पड़े, इसके लिए विस्तृत अध्ययन किए जा रहे हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आपदा शमन उपायों पर चर्चा चल रही है, जिसमें पूर्व चेतावनी प्रणालियां, सुरक्षात्मक संरचनाएं और संवेदनशील निचले इलाकों के समुदायों के लिए दीर्घकालिक सुरक्षा योजनाएं शामिल हैं। इस अभियान में जल स्तर, भूवैज्ञानिक स्थिरता और बाढ़ जोखिमों का आकलन करने के लिए ड्रोन मैपिंग, बाथिमेट्रिक सर्वेक्षण, लिडार और उपसतही अध्ययन जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इसके निष्कर्ष हिमालयी क्षेत्र में नियोजन, आपदा तैयारी और जलवायु स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेंगे।

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