स्नो लेपर्ड और रेड पांडा के संरक्षण पर जागरुकता कार्यक्रम आयोजित

मंगन : स्नो लेपर्ड और रेड पांडा के संरक्षण तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़े मुद्दों को लेकर आज वन एवं पर्यावरण विभाग के तहत कंचनजंगा नेशनल पार्क एंड वाइल्डलाइफ डिवीजन की ओर से जिला भवन में एक कार्यशाला सह जागरुकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य राज्य के नाजुक पहाड़ी जैव विविधता और लंबे समय तक संरक्षण के महत्व के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़ाना था।

कार्यशाला में रेड पांडा और स्नो लेपर्ड की संरक्षण स्थिति खास फोकस करते हुए बताया गया कि समूचे देश में सिक्किम में ही रेड पांडा की दूसरी सबसे बड़ी आबादी निवास करती है, जबकि हाल के निगरानी अभियान में राज्य के अंदर 21 स्नो लेपर्ड रिकॉर्ड किए गए हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि इन प्रजातियों का बचना निवास सुरक्षा, शिकार की उपलब्धता और बाहरी खतरों में कमी से काफी हद तक जुड़ा हुआ है।

वहीं, बातचीत में मानव-वन्यजीव टकराव के उभरते कारणों की ओर चर्चा हुई, जिनमें खुले घूमने वाले कुत्तों की बढ़ती मौजूदगी, भालू तथा बंदर जैसे जंगली जानवरों को बिना रोक-टोक के खाना खिलाना, जंगली खाने के स्रोत जैसे नेपाली हॉग प्लम, जंगली एवोकाडो और बांस के अंकुरों का दोहन शामिल था। खाने के कचरे का ठीक से प्रबंधन न होना और गलत तरीके से फेंकने को भी ऐसे कारण माना गया जो अनजाने में जंगली जानवरों को इंसानी बस्तियों के करीब खींचते हैं।

इस दौरान, वक्ताओं ने पर्यावरण रक्षा और उसे बेहतर बनाने में राज्य और यहां के नागरिकों की साझा संवैधानिक जिम्मेदारी को दोहराया। इस बात पर जोर दिया गया कि कई वन्यजीव दबाव इंसानी गतिविधियों और संसाधन के बढ़ते इस्तेमाल से पैदा होते हैं, इसलिए प्राकृतिक निवास के लिए जागरुकता, जिम्मेदारी और सम्मान पर आधारित जानकारी के साथ साथ रहना जरूरी है।

साथ ही, सिक्किम की जैव-विविधता की अहमियत पर जोर देते हुए, विशेषज्ञों ने कहा कि हालांकि यह राज्य देश के भूभाग का सिर्फ 0.2 प्रतिशत हिस्सा ही है, लेकिन यह देश की लगभग 25 प्रतिशत बायोडायवर्सिटी को सपोर्ट करता है। रोडोडेंड्रोन की 36 प्रजातियों की मौजूदगी एक बायोलॉजिकल हॉटस्पॉट के तौर पर इसकी स्थिति और लगातार बचाव के उपायों की तुरंत जरूरत को और दिखाती है।

इसके अलावा, कार्यशाला में कई सुझाव भी दिए गए, जिनमें पशुपालन विभाग के साथ मिलकर रैपिड रिस्पॉन्स टीम बनाना, हिमाल रक्षकों तथा पर्यावरण विकास कमेटियों को मजबूत करना, बीमारी की जांच करने वाली लैब को मजबूत बनाना और पर्यटन मार्गों पर कुत्तों के आने-जाने को नियंत्रित करना शामिल है। साथ ही, चरने वाले झुंडों के साथ जाने वाले कुत्तों का टीकाकरण, स्टेरिलाइजेशन, पंजीकरण एवं दूसरे उपायों पर भी चर्चा की गई।

कार्यक्रम में उपाध्यक्ष सोनम किपा भूटिया, एडीएम पेमा वांगचेन नामकार्पा, एसडीएम संदीप कुमार, पशुपालन विभाग के जेडी डॉ हिस्से डोमा लेप्चा, प्रमुख निदेशक (अनुसंधान एवं विस्तार) उषा लाचुंग्‍पा, सीएफ सह फील्ड निदेशक सूरज थटाल, केएनपी डीएफओ कर्मा वांग्याल लेप्चा, डीएफओ कर्मा गोले लाचुंग्‍पा, एसीएफ सीमा बस्‍नेत, केएनपी एसीएफ नीरज प्रधान, मंगन बीडीओ कैलाश थापा, जंगू बीडीओ डॉ महेंद्र तमांग, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ/भारत के कार्यक्रम प्रबंधक अथर्व सिंह के साथ अन्य भी शामिल हुए।

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