मांगमू गांव में मिली प्राचीन पत्थर की संरचनाएं

पुरातत्व विभाग ने शुरू किया शोध

गंगटोक : गेजिंग जिलान्तर्गत मानेबोंग-देंताम क्षेत्र के मांगमू गांव की एक प्राचीन कब्रगाह में प्राचीन पत्थर की संरचनाएं मिलने से यह जगह पुरातात्विक विशेषज्ञों की नजर में आ गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा रिसर्च के हिस्से के रूप में शुरुआती सर्वे से पता चलता है कि यह सिक्किम में खोजी गई ऐसी सबसे पुरानी जगहों में से एक है।

एएसआई के शोधकर्ता हरि चंद्र शर्मा ने कहा कि यह खोज लगभग एक महीने पहले सोशल मीडिया पर कुछ मिलने के बाद शुरू हुई। उन्होंने कहा, तस्वीरों में दिख रही संरचनाएं असामान्य लग रही थीं और मेगालिथिक (पाषाण) संरचनाओं जैसी थीं, जिससे मुझे व्यक्तिगत रूप से उस जगह का दौरा करने के लिए प्रेरित किया।

इसके बाद, मांगमू गांव की अपने फील्ड विजिट के दौरान शर्मा ने कई पत्थर की संरचनाओं की पहचान की जो पत्थर के प्लेटफॉर्म, खंभे, या एक आवासीय परिसर के अवशेष भी हो सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये शुरुआती सर्वेक्षण हैं और अभी तक इसकी वैज्ञानिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है।

शर्मा ने बताया कि सीधी खड़ी पत्थर (डोलमेन), स्लैब जैसी संरचनाएं और बादाम के आकार की व्यवस्था जैसी विशेषताएं आमतौर पर पाषाणयुगीन संस्कृतियों से जुड़ी होती हैं। उन्होंने कहा, मेघालय और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में ज्ञात प्राचीन जगहों की तुलना में, ये संरचनाएं बताती हैं कि यह एक देर से प्राचीन दफनाने की जगह हो सकती है।

स्थानीय कहानियों से यह भी पता चलता है कि इस क्षेत्र का उपयोग प्राचीन काल में कब्रिस्तान के रूप में किया गया होगा। हालांकि, ग्रामीणों को अब उस जगह की कोई स्पष्ट याद नहीं है। शर्मा के अनुसार, ऐसे में, यह इसकी अत्यधिक प्राचीनता और लंबे समय तक उपेक्षा की ओर इशारा कर सकता है।

वहीं, इस जगह के महत्व को बढ़ाते हुए कथित तौर पर पास के निर्माण कार्य के दौरान जीवाश्म जैसे अवशेष और पंक्तिबद्ध पत्थर की संरचनाएं पाई गईं। हालांकि ये निष्कर्षों का अभी वैज्ञानिक सत्यापन नहीं हुआ है, फिर भी वे इस क्षेत्र की पुरातात्विक क्षमता को और रेखांकित करते हैं।

शर्मा ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण राज्य सरकार से आधिकारिक अनुरोध मिलने के बाद ही औपचारिक जांच शुरू कर सकता है। उन्होंने कहा, एक बार अनुमति मिलने के बाद एएसआई एक गहन सर्वेक्षण करेगा, जिसके बाद यदि आवश्यक समझा गया तो खुदाई की जाएगी।

इधर, बसंत गुरुंग नामक एक स्थानीय निवासी ने कहा कि ग्रामीणों को पहले इस जगह के प्राचीन स्वरूप के बारे में पता नहीं था। उनके अनुसार, हमारे पूर्वजों का मानना था कि इस जगह पर जाने से बीमारी हो सकती है, इसलिए लोग इससे बचते थे। पहले, पूरा इलाका घने जंगल से ढका हुआ था।

गुरुंग ने कहा कि इस जगह को शुरू में गणित गुरुंग लामा ने अपनी मठ की पढ़ाई के बाद ध्यान करने की जगह के रूप में चुना था। गुरुंग ने कहा, उन्होंने तय किया कि उस इलाके को साफ़ कर एक मठ बनाया जाए। सभी ग्रामीण जंगल साफ करने के लिए एक साथ आए। गांव के बुज़ुर्गों में आज भी यह मान्यता है कि रात में उस जगह पर नहीं जाना चाहिए क्योंकि वहां कुछ अजीब घटनाएं देखी गई हैं। बुज़ुर्ग रात में कुछ चमकती हुई रोशनी देखने की घटनाएं भी बताते हैं।

बहरहाल, शर्मा के आकलन के बाद ही गांव वालों को उस जगह के संभावित पुरातात्विक महत्व के बारे में पता चला। गुरुंग ने यह भी बताया कि जंगल साफ होने के बाद, 2005 के आसपास प्राचीन पाली, जोंग्खा भाषाओं में लिखे शिलालेखों वाले पत्थर के निशान और कुछ पर ‘ओम मणि पद्मे हुम’ का तिब्बती शिलालेख और गुरु पद्मसंभव से जुड़ी नक्काशी देखी गई। ये छोटे नक्काशीदार पत्थर अब दिखाई नहीं देते हैं और माना जाता है कि वे पास की एक चट्टान से नीचे गिर गए हैं।

जानकारों के अनुसार, अगर इस शुरुआती सर्वेक्षण की पुष्टि हो जाती है तो यह जगह पूर्वी हिमालय क्षेत्र में शुरुआती इंसानी बस्तियों, प्रवास तरीकों और सांस्कृतिक बदलावों के बारे में बहुमूल्य जानकारी दे सकती है, जिससे सिक्किम के कम ज्ञात प्रागैतिहासिक अतीत पर नई रोशनी पड़ेगी।

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