सांसद राजू बिष्ट ने चाय श्रमिकों की स्थिति पर जताई चिंता

दार्जिलिंग : दार्जिलिंग के भाजपा सांसद सह पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजू बिष्ट ने राज्य में मौजूदा टीएमसी शासन और इससे पहले की सरकारों के समय दार्जिलिंग पहाड़, तराई और डुआर्स क्षेत्रों में चाय बागानों एवं वहां काम करने वाले श्रमिकों की खराब स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार इन चाय बागानों एवं श्रमिकों की स्थिति सुधारने हेतु प्रतिबद्ध है। उन्होंने भाजपा की सरकार बनने पर चाय बागान एवं श्रमिकों की स्थिति सुधारने की दिशा में चार नये श्रम कानून लागू करने का आश्वासन दिया।

सांसद Raju Bista ने एक विज्ञप्ति में कहा कि अपनी अपार प्राकृतिक सुंदरता, जातीय एवं सांस्कृतिक विविधता और अनोखे कृषि-जलवायु कारकों के कारण यह क्षेत्र दुनिया की कुछ बेहतरीन चाय का उत्पादन करता है, और यह सिंकोना और अन्य औषधीय पौधों का भी केंद्र है। हालांकि, इन क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों को पीढि़यों से शोषण का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक अतीत और राज्य में राजनीतिक व्यवस्थाओं की उपेक्षा में हैं। उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, हम इसे बदलने और क्षेत्र के मजदूरों के लिए गरिमा, सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण वाला भविष्य देने के लिए काम कर रहे हैं।

भाजपा सांसद ने क्षेत्र में चाय एवं सिंकोना उत्पादन के इतिहास पर नजर डालते हुए बताया कि 1800 के दशक में, चाय यूरोप में बहुत ज्यादा मांग वाली चीज थी, और चाय उत्पादन पर चीन का पूरा एकाधिकार था। इसे तोड़ने के लिए, अंग्रेजों ने भारत में चाय बागान के साथ प्रयोग करना शुरू किया और 1840 के दशक में डॉ. आर्चीबाल्ड कैंपबेल ने दार्जिलिंग में पहले चाय के पौधे लगाए। पहले व्यावसायिक बागान 1850 के दशक तक पहाड़ में, 1862 तक तराई में, और 1870 के दशक तक डुआर्स में शुरू हो गए थे। सिनकोना औषधीय बागान लगभग 1860 के दशक में व्यावसायिक रूप से उगाए गए थे। 1870 के दशक तक यहां चाय और सिंकोना का व्यवसायिक उत्पादन होने लगा था।

चाय उद्योग का विकास इतना हुआ कि जब भारत को आजादी मिली, उस समय तक चाय, जूट, कपास और मसालों के साथ मिलकर भारत के कुल निर्यात का 60 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा था। हालांकि, चाय और सिंकोना उद्योग के तेजी से बढ़ने के बावजूद यहां के श्रमिकों को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इसने मूल समुदायों को विस्थापित किया, हमारे पुराने जंगलों और पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर दिया। अंग्रेज अपने पीछे शोषण की एक विरासत छोड़ गए, जो आज भी मजदूरों को प्रभावित करती है।

सांसद ने कहा, आजादी के बाद, चाय उद्योग फला-फूला, लेकिन मजदूरों को लगातार परेशानी झेलनी पड़ी। कांग्रेस, सीपीआईएम और अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के तहत पश्चिम बंगाल की लगातार सरकारों ने चाय मजदूरों को सम्मानजनक मजदूरी और उनकी पुश्तैनी जमीन का पट्टा देने से इनकार कर दिया है। टीएमसी सरकार के तहत मजदूरों को समय पर मजदूरी, बोनस जैसे अधिकारों से वंचित किया गया है, और हजारों लोगों को उनकी पेंशन से वंचित कर दिया गया है। ऐसे में, फिलहाल चाय श्रमिक गरीबी के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं। बागानों में मजदूरी बहुत कम रखकर, पश्चिम बंगाल सरकार स्थानीय युवाओं को बेहतर अवसरों की तलाश में पलायन करने के लिए मजबूर कर रही है, जबकि वे चुपचाप इस क्षेत्र में रोहिंग्या और अवैध बांग्लादेशी वोट बैंक बसा रहे हैं।

उनके अनुसार, इस दयनीय स्थिति को बदलने के लिए पीएम मोदी के “सबका साथ, सबका विकास” के विजन से प्रेरित केंद्र सरकार श्रमिक सशक्तिकरण की दिशा में काम कर रही है। इस विजन के केंद्र में श्रमिकों को पर्जा पट्टा देना, समर्पित कल्याण कोष और चार नए श्रम कानूनों को लागू करना है। इन श्रम कानूनों में वेजेज कोड; सामाजिक सुरक्षा संहिता; व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य शर्तें संहिता और औद्योगिक संबंध संहिता शामिल हैं। पश्चिम बंगाल में लंबे समय से लंबित ये सुधार, उचित मजदूरी प्रदान करने के साथ-साथ नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे, बेहतर सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेंगे और श्रमिकों के रहने तथा काम करने की स्थिति में सुधार करेंगे।

सांसद ने आगे कहा कि ये सुधार सिर्फ ज्यादा सैलरी और बेहतर काम की स्थितियों के बारे में नहीं हैं, बल्कि ये सशक्तिकरण, न्याय, समानता और निष्पक्षता के बारे में भी हैं। राज्य में हमारी सरकार बनते ही भाजपा इन कोड्स को लागू करेगी। हम मजदूरों की पुश्तैनी जमीन के लिए पर्जा-पट्टा अधिकार सुनिश्चित करेंगे, और यह भी सुनिश्चित करेंगे कि मजदूरों को सम्मानजनक सैलरी मिले जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो।

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