इंदौर जल प्रदूषण संकट : दर्पण झूठ न बोले

तनवीर जाफ़री

मध्य प्रदेश के महानगर इंदौर के भागीरथपुरा इलाक़े में दिसंबर 2025 के जाते जाते दूषित पेयजल की वजह से एक बड़ा स्वास्थ्य संकट पैदा हो गया। इस घटना ने उस इंदौर शहर की हक़ीक़त को उजागर कर दिया जिसे भारत का सबसे स्वच्छ शहर होने का गौरव भी हासिल है। ग़ौर तलब है कि जुलाई 2025 में घोषित स्वच्छ सर्वेक्षण 2024-25 के परिणामों के अनुसार इंदौर ने लगातार आठवीं बार देश के सबसे स्वच्छ शहर का ख़िताब जीता है। यह भारत सरकार के आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा कराया जाने वाला विश्व का सबसे बड़ा शहरी स्वच्छता सर्वेक्षण बताया जाता है। यह रैंकिंग कचरा प्रबंधन, नागरिक भागीदारी, स्वच्छता और स्वच्छता सम्बन्धी अन्य मानकों पर आधारित है। हालांकि गत वर्षांत में इंदौर में स्वच्छ पानी की पाइप लाइन में सीवरेज के गंदे व प्रदूषित पानी मिले होने की घटना स्वच्छता सर्वेक्षण के दायरे यानी मुख्य रूप से सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट से अलग मुद्दा है, लेकिन निश्चित रूप से इस घटना ने  इंदौर के नंबर वन होने के ‘ख़िताब’ पर प्रश्न चिन्ह ज़रूर खड़ा कर दिया है। इस घटना से एक सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि जब लगातार आठ बार भारत के सबसे स्वच्छ रहने का ख़िताब जीतने वाले महानगर इंदौर के लोग सीवरेज युक्त पेयजल पीने को मजबूर हैं तो उन शहरों का क्या जिनकी गिनती ही देश के गंदे शहरों में होती है ?

इस घटना के बाद सत्ता की ओर से कई तरह की ‘बाज़ीगरी’ करने की कोशिश की गयी। लोगों की मौतों के आंकड़े को छुपाने व कम बताने की कोशिश की गयी। एक तरफ़ अस्पताल की रिपोर्ट व प्रभावित परिजनों के दावे 16 लोगों की मौत की पुष्टि कर रहे थे तो राज्य सरकार उच्च न्यायलय में केवल चार लोगों की मौत का दावा करती रही। ख़बरों के अनुसार इस घटना से 1400 से अधिक लोग उल्टी, दस्त, डिहाइड्रेशन और बुख़ार जैसी समस्याओं से प्रभावित हुए। इनमें से लगभग 260 लोग अस्पताल में भर्ती हुए। उधर इसी विषय पर मध्य प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इंदौर में दूषित पानी से कई लोगों की मौत और बीमारी के मामले पर मीडिया के सवालों से नाराज़ होकर एक पत्रकार से निहायत बदतमीज़ी भरा व्यवहार किया। जब उनसे एक टी वी रिपोर्टर ने पूछा कि साफ़ पानी की व्यवस्था क्यों अपर्याप्त है। इस पर विजयवर्गीय भड़क गए और कहा, छोड़ो यार, फोकट (फालतू) के सवाल मत पूछो। क्या घंटा होकर आए हो तुम? जैसे आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया।  हालांकि बाद में विजयवर्गीय ने माफ़ी मांग कर मामले को रफ़ा दफ़ा करने की कोशिश ज़रूर की परन्तु तब तक इन घटिया शब्दों द्वारा व्यक्त किये गये उनके भीतर के ‘उदगार ‘ उनकी सरकार की विफलता की खीज के रूप में प्रकट हो चुके थे।

बहरहाल इस घटना ने देश की उस वास्तविकता को एक बार फिर बेनक़ाब कर दिया है जहाँ विकास के तमाम दावों व आंकड़ों के बावजूद देश के आम लोगों को अभी तक पीने का साफ़ पानी तक मयस्सर नहीं है। वास्तव में  भारत में प्रदूषित जल का सेवन एक लंबे समय से चली आ रही समस्या है, जो औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, कृषि क्रांति और जनसंख्या वृद्धि से जुड़ी हुई है। यह समस्या न केवल स्वास्थ्य पर असर डालती है, बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय नुक़्सान भी पहुंचाती है। गंगा और यमुना जैसी देश की अनेक नदियों में अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट डालना भी जलजनित बीमारियों का मुख्य कारण है। हरित क्रांति के दौर में जब उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग बढ़ा, उस दौर में भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण फैलने की ख़बरें आईं। उस समय देश के 56 प्रतिशत ज़िलों में इसका प्रभाव पाया गया। इसी तरह डी डी टी जैसे कीटनाशकों के अत्यधिक उत्पादन व प्रयोग से इनके अवशेष जल में बने रहे। साथ ही औद्योगिक विकास के नाम पर नदियों में लीड, कैडमियम, आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का प्रदूषण बढ़ा। इस दौर में भी कॉलरा(हैज़ा ) और डायरिया जैसी महामारियां बढ़ीं, और मौतों की संख्या में और भी वृद्धि हुई।  सूत्रों के अनुसार आज भी भूजल अर्थात 85 प्रतिशत ग्रामीण इलाक़ों में पीने का पानी नाइट्रेट, धातुओं और बैक्टीरिया से प्रदूषित है। इसके अलावा बाढ़ से भी प्रदूषण बढ़ता है।

अब रहा सवाल जल आपूर्ति लाइन में सीवरेज का पानी मिलकर प्रदूषित जल आपूर्ति होने का, तो यह कोई अकेले इंदौर की समस्या मात्र नहीं बल्कि देश के तमाम शहर व इलाक़े ऐसी समस्याओं का शिकार हैं। उल्टी, दस्त, डिहाइड्रेशन और बुख़ार जैसी बीमारी की समस्यायें आज घर घर की समस्याएं बन चुकी हैं। इसका मुख्य कारण है भूमिगत जल पाइप लाइन का प्रायः भूमिगत सीवर लाइनों के साथ साथ या उसके समानांतर बिछा होना। यह समस्या उस समय और भी विकराल रूप धारण कर लेती है जबकि सीवर लाइनें ओवर फ़्लो हो कर भूमिगत सीवरेज रिसाव को बढ़ाती हैं और साथ ही यदि भूमिगत जल पाइप लाइन में भी लीकेज हो तो सीवर और पीने के पानी मिक्स हो जाता है। वास्तव में यह समस्या ग़लत योजना,भ्रष्टाचारपूर्ण निर्माण, समय पर रखरखाव का अभाव,प्रशासनिक लापरवाही व ऐसी समस्याओं की लगातार अनदेखी करने के कारण होती हैं।

यही वजह है कि प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जल और स्वच्छता से संबंधित बीमारियों से लगभग 400,000 मौतें प्रति वर्ष दर्ज होती हैं जबकि प्रदूषित पानी से लगभग 300,000 बच्चे प्रतिवर्ष मरते हैं तथा डायरिया से क़रीब 1,600 मौतें प्रतिदिन होती हैं। विश्व बैंक के अनुसार ऐसी 21 प्रतिशत संक्रामक बीमारियां असुरक्षित जल से जुड़ी हैं । देश की आर्थिक स्थिति पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। पर्यावरणीय क्षति से 3.75 ट्रिलियन रुपये अर्थात 80 बिलियन डॉलर का वार्षिक नुक़्सान होता है क्योंकि इससे स्वास्थ्य लागत लगभग 470-610 बिलियन रुपये यानी 6.7-8.7 बिलियन बढ़ जाती है। साथ ही प्रदूषित क्षेत्रों में कृषि राजस्व में 9 प्रतिशत की और उपज में 16 प्रतिशत की अनुमानित कमी आती है।

लिहाज़ा यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में सीवर मिश्रित दूषित पानी से हुई 15 (फ़िलहाल ) मौतों ने यह साबित कर दियाहै कि “इंदौर में स्वच्छ पानी नहीं, बल्कि ज़हर मिश्रित जलापूर्ति की गयी। स्थानीय लोगों द्वारा बार-बार गंदे, बदबूदार पानी की शिकायत की गयी, फिर भी कोई सुनवाई नहीं हुई? सीवर का प्रदूषित मलयुक्त जल पीने के पानी में कैसे मिला? समय पर सप्लाई बंद क्यों नहीं की गई? ज़ाहिर है कि स्वच्छ जल हासिल करना प्रत्येक देशवासियों के जीवन का अधिकार है। परन्तु इंदौर में उपजे जल प्रदूषण संकट से भारतीय जनता पार्टी की कथित डबल इंजन  सरकार ने यह साबित कर दिया है कि दर्पण कभी भी झूठ नहीं बोलता।

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