एचएचटीडीसीएसएस ने न्यूनतम वेतन की मांग पर निकाली रैली

दार्जिलिंग : पहाड़, तराई और डुआर्स के चाय बागानों में श्रमिकों के पक्ष में न्यूनतम वेतन अधिनियम (मिनिमम वेजेस एक्ट) को तत्काल लागू करने की मांग करते हुए इंडियन गोरखा जनशक्ति फ्रंट (आईजीजेएफ) के अंतर्गत ट्रेड यूनियन ‘हाम्रो हिल तराई डुआर्स चिया श्रमिक संघ’ (एचएचटीडीसीएसएस) ने आज दार्जिलिंग में विशाल रैली निकाली।

रैली आईजीजेएफ पार्टी कार्यालय, मॉल रोड से शुरू होकर चौकबाज़ार और नेहरू रोड होते हुए दार्जिलिंग टी एसोसिएशन के कार्यालय पहुंचकर समाप्त हुई। प्रतिभागियों ने ‘श्रमिक एकता ज़िंदाबाद’ और ‘मजदूर एकता ज़िंदाबाद’ के नारे लगाकर दार्जिलिंग को गुंजायमान कर दिया। संघ ने बताया कि 19 जनवरी से रैली, धरना और प्रदर्शन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। ट्रेड यूनियन ने आज भी डीटीए के समक्ष मांगपत्र सौंपा।

संघ के केंद्रीय अध्यक्ष डीके गुरुंग ने पत्रकारों से कहा, चाय श्रमिकों को प्रतिदिन 250 रुपये मजदूरी मिलती है, जिसमें से 30 रुपये पीएफ के लिए कट जाते हैं और हाथ में केवल 220 रुपये आते हैं। वर्तमान महंगाई में इस राशि से परिवार चलाना संभव नहीं है, इसलिए हमने न्यूनतम वेतन अधिनियम लागू करने की जोरदार मांग की है।

उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य श्रम मंत्रालय से लेकर संबंधित अधिकारियों को कई बार पत्र और ज्ञापन देने के बावजूद सरकार ने ध्यान नहीं दिया। दार्जिलिंग टी एसोसिएशन के संदीप मुखर्जी, इंडियन टी एसोसिएशन के मोहन छेत्री और जीटीए के अतिरिक्त श्रम आयुक्त को भी श्रमिक संगठन ने न्यूनतम वेतन अधिनियम लागू करने की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपा है।

गुरुंग ने कहा कि चाय बागानों में आठ घंटे कार्य की बाध्यता, मालिकों की मनमानी और श्रमिक शोषण का अंत होना चाहिए। सरकार द्वारा गठित एडवाइजरी कमेटी की बैठकों का विवरण सार्वजनिक न करने पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, चाय श्रमिकों ने सहनशक्ति से अधिक सहा है और अब स्थिति सीमा पार कर रही है। फरवरी के अंत तक कोलकाता जाकर राज्य श्रम मंत्री से भी बातचीत करने की योजना है। अन्य उद्योगों में मिनिमम वेजेस एक्ट लागू हुए वर्षों बीत चुके हैं, फिर चाय बागानों में देरी क्यों?

उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि जब देश की अन्य कंपनियों तथा बीड़ी उद्योग में भी न्यूनतम वेतन अधिनियम लागू है, तो चाय बागानों में क्यों नहीं। उन्होंने बताया कि राज्य के श्रम मंत्री से इस विषय में पहले ही मुलाकात कर चुके हैं और 220 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी में परिवार का पालन-पोषण असंभव होने की बात रख चुके हैं। मंत्री ने विचार करने का आश्वासन दिया था, किंतु अब तक कोई परिणाम सामने नहीं आया।

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